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पीपीई की गुणवत्ता का सवाल

पत्रलेखा चटर्जी
Updated Wed, 05 Aug 2020 05:37 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media

महामारी के लगभग छह महीनों के दौरान वायरस के बारे में जवाब से अधिक सवाल हैं। वास्तव में कोई नहीं जानता कि कितने भारतीय नए कोरोना वायरस से संक्रमित हुए हैं और कितने लोग मरे हैं। शायद हम जान भी नहीं पाएंगे, क्योंकि बहुत से लोग बिना लक्षणों वाले हैं और देश के सभी राज्यों में मृत्यु पंजीकरण प्रणाली ठीक नहीं है। कोई भी आधिकारिक रूप से यह अनुमान नहीं लगा सकता कि कब हम कोरोना वैक्सीन का उपयोग कर पाएंगे।



इन सभी अनिश्चितता के बीच एक मुद्दा, जो हमें चिंतित करता है, वह है हमारी संक्रमण नियंत्रण रणनीतियों की स्थिति। वे कितने प्रभावी हैं? एक सवाल जो मुझे बहुत परेशान कर रहा है, वह है गुणवत्ता का मुद्दा। हम सभी जानते हैं कि महामारी की शुरुआत में अन्य देशों की तरह भारत भी पर्सनल प्रोटेक्टिव एक्विपमेंट (पीपीई) विदेशों से मंगाता था।


घरेलू स्तर पर पीपीई का निर्माण फरवरी के करीब ही शुरू हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में हमें बताया कि अब भारत पीपीई का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता बन गया है। छह महीने के भीतर 1,200 से ज्यादा कंपनियां पीपीई किट बना रही हैं और हर दिन तीन लाख से ज्यादा एन-95 मास्क बनाए जाते हैं। यह एक अच्छी खबर है, लेकिन क्या मात्रा पर निरंतर ध्यान हमें गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करने से रोक रहा है?


इस महामारी ने पीपीई, हैंड सैनिटाइजर, मास्क इत्यादि के कुटीर उद्योगों को जन्म दिया है। चिकित्सा आपूर्ति से कोई संबंध नहीं रखने वाले लोगों ने इसे एक अवसर की तरह लिया और सुरक्षात्मक उपकरण बनाने लगे। और अब स्वदेशी पीपीई किट की बाढ़ आ गई है। उनमें से बहुत बिक नहीं रहे हैं और उनकी कीमतें घट गई हैं।


इस उद्योग के लोगों से बात करते हुए यह स्पष्ट हुआ कि पीपीई बाजार में गुणवत्ता एक गंभीर मुद्दा है। घटिया पीपीई, सैनिटाइजर, दस्ताने आदि के बारे में शिकायतों की बाढ़ आ गई है, जो संक्रमण नियंत्रण रणनीति के लिए देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रियाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता बढ़ा रही है।


यूनाइटेड नर्सेज एसोसिएशन के मुताबिक, 30 जून तक अकेले दिल्ली में एक हजार से ज्यादा नर्सें संक्रमित हुईं। एसोसिएशन के महासचिव ने बताया कि चीजें सुधर रही हैं और अस्पताल यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि उनके स्वास्थ्यकर्मी उचित ढंग से सुरक्षित रहें।


सबसे चिंता की बात है कि एक बार उपयोग में आने वाले पीपीई किट का कई बार उपयोग किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन केवल अंतिम उपाय के रूप में गहन परिशोधन के बाद पीपीई के एकाधिक उपयोग की अनुमति देता है, जब पीपीई एकदम अनुपलब्ध हो।
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इन सभी समस्याओं की जड़ है अनिवार्य मानकों का अभाव। प्रिवेंटिव वियर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन डॉ. संजीव रेहान कहते हैं, सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन ने चिकित्सीय उपयोग के लिए पीपीई किट्स के किसी भी वर्गीकरण को परिभाषित नहीं किया है। चिकित्सीय उपकरण नियमों के तहत वर्गीकरण के बिना उद्योग के लिए लागू नियामक जरूरतों को समझना संभव नहीं है।


उद्योग जगत और सरकार के बीच बैठकों के बाद चीजें थोड़ी सुधरने लगी हैं। रेहान कहते हैं कि भारत की राष्ट्रीय मानक संस्था ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआईएस) पहले से ही पीपीई के लिए मानक बनाने की दिशा में काम कर रहा था, जो वैश्विक मानक के अनुरूप होगा। बड़ी संख्या में पीपीई निर्माता लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) क्षेत्र में आते हैं। उन्हें अपनी तकनीक और बुनियादी ढांचे को उन्नत बनाने के लिए सहयोग की जरूरत है।


एमएसएमई मंत्रालय और राज्य सरकारों को उन्हें सहयोग करना चाहिए, ताकि वे वैश्विक मानकों पर खरा उतरें। यह कोई धर्मार्थ काम नहीं है। वैश्विक बाजार का दोहन करने के इच्छुक पीपीई निर्माताओं को सफलतापूर्वक निर्यात में सक्षम होने के लिए वैश्विक मानकों पर खरा उतरने की जरूरत है। और अपने डॉक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा के बिना संक्रमण नियंत्रण की हमारी रणनीति काम नहीं करेगी। उनकी सुरक्षा में ही हमारी सुरक्षा है।

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