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संसद सत्र बुलाने में मुश्किल क्या है, बता रही हैं नीरजा चौधरी

नीरजा चौधरी
Updated Tue, 04 Aug 2020 02:32 AM IST
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संसद हमले की आज 18वीं बरसी है - फोटो : ANI

संसद की कुछ स्थायी समितियों ने फिर से काम करना शुरू कर दिया है, जो एक स्वागतयोग्य कदम है। इस बात की भी मांग बढ़ रही है कि संसद का मानसून सत्र जल्द बुलाया जाए। चूंकि कोविड-19 जल्दी खत्म नहीं होने वाला है और बेहतर उम्मीद भी करें, तो इसका टीका आने में भी कई महीनों की देरी है। ऐसे में लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को दोनों सदनों में कामकाज शुरू करवाने के लिए उपाय तलाशने होंगे।



रोजाना 50,000 से अधिक नए मामले सामने आने और दुनिया में तीसरा सबसे ज्यादा संक्रमण वाला देश होने के बावजूद आखिरकार जीवन सामान्य स्थिति की ओर लौट रहा है। अनलॉक-3 शुरू हो चुका है। इसके तहत पांच अगस्त से कई और प्रतिबंध खत्म होंगे। अनलॉक-3 के दौरान शहरों में रात का कर्फ्यू खत्म होगा, जिम खुल जाएंगे। वैसे घरेलू उड़ानों ने कुछ हद तक काम करना शुरू कर दिया था और कुछ ट्रेनें भी चल रही थीं। शादी समारोह में 50 और अंत्येष्टि में 20 लोगों को शामिल होने की इजाजत मिल ही गई थी। श्रद्धालुओं को मंदिरों में जाने की इजाजत भी मिल गई है।


और अब प्रधानमंत्री मोदी अयोध्या में बनने वाले राममंदिर के भूमिपूजन में शामिल होंगे। इस अवसर के लिए 200 लोगों को आमंत्रित किया गया है, जो एक ऐसे मुद्दे को खत्म करेगा, जिसने 70 वर्षों से भारतीय राजनीति को नुकसान पहुंचाया है। जाहिर है, आलोचकों का कहना है कि हम जिस मुश्किल वक्त में जी रहे हैं और कोविड-19 के बढ़ते मामलों के साथ उत्तर प्रदेश की सरकार जिस बड़ी चुनौती का सामना कर रही है, उसे देखते हुए, जब हमने मंदिर के लिए सात दशकों तक इंतजार किया है, तो और सात महीने इंतजार कर सकते थे।


राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सफाई और अन्य व्यवस्थाओं की निगरानी के लिए वहां जाना पड़ा, क्योंकि इस अवसर पर प्रधानमंत्री वहां जाने वाले हैं। भाजपा को मुख्यधारा की राजनीति में लाने में अयोध्या मुद्दे की अहम भूमिका रही है, इसे देखते हुए प्रधानमंत्री ने वहां जाने का फैसला किया। राजनीतिक घटनाक्रम भी स्थिति के सामान्य होने का एहसास दिला रहे हैं।


राजस्थान सरकार को अपने पूर्व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट द्वारा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ आंतरिक विद्रोह का खतरा है। जैसा कि हमने देखा, स्पीकर के अधिकार को अदालत में चुनौती दी गई है, राजनीति के खेल में माहिर मुख्यमंत्री और उतने ही तेज राज्यपाल के बीच नाटकीय ढंग से विवाद हुआ। जाहिर है, राजनीतिक पैतरेबाजियां फिर से शुरू हो गई हैं। हालांकि कई लोग कह रहे हैं कि यह पैंतरेबाजी का समय नहीं है, जब कोविड-19 चरम पर है और उनकी बात में दम है।


दूसरे स्तर पर वे कोविड की गंभीर वास्तविकता से ध्यान हटाते हुए पुराने और परिचित 'सामान्य' स्थिति का दम भरते हैं। हालांकि इस सवाल को टाला नहीं जा सकता कि अगर कोविड के बावजूद यह सब संभव हो सकता है, तो फिर संसद का सत्र क्यों नहीं चल सकता!


विपक्षी दल मांग कर रहे हैं कि पिछले चार महीनों में सामने आए कई मुद्दों पर चर्चा के लिए संसद सत्र बुलाया जाए। सरकार ने तालाबंदी और महामारी का प्रबंधन करने के लिए कई फैसले लिए हैं, साथ ही अस्पतालों और चिकित्सा सुविधाओं की कमी का भी मुद्दा है। इस दौरान वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ टकराव भी हुआ है। सरकार ने बीस लाख करोड़ रुपये के वित्तीय पैकेज की घोषणा की और उसने कई क्षेत्रों में एफडीआई बढ़ाने जैसे कई सुधार किए हैं।
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अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा है। बैंकिंग क्षेत्र की सेहत चिंताजनक है। इसी तरह स्वास्थ्य एवं समाज के सबसे कमजोर तबके, बच्चे, महिलाएं एवं प्रवासियों के कल्याण पर पड़ा असर भी महत्वपूर्ण है। उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुई हैं और हमें समझना होगा कि उनके साथ गांवों में क्या हो रहा है। और फिर अभी-अभी नई शिक्षा नीति की घोषणा हुई है, जिसका हमारे बच्चों के जीवन पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा और यह भी व्यापक बहस का आह्वान करता है।


संसद बहस करने और सवाल पूछने का मंच है। अन्य देशों ने भी किसी न किसी तरह से अपनी-अपनी संसद का सत्र बुलाया है। इनमें वे देश शामिल हैं, जो महामारी से बुरी तरह प्रभावित थे, जैसे-इटली, फ्रांस, स्पेन, ब्रिटेन और पड़ोसी नेपाल भी। इसलिए हमें भी संसद को अहम मुद्दों पर विचार करने और विपक्ष की आवाज सुनने में सक्षम बनाने के तरीके खोजने होंगे।


अब कुछ स्थायी समितियों ने बैठकें शुरू कर दी हैं तथा उन्होंने महामारी के प्रभाव पर गौर किया है। वे शारीरिक रूप से भी मिल-बैठ रहे हैं, हालांकि कुछ सांसदों को ऑनलाइन विचार के लिए बुलाया गया। स्थायी समितियों के महत्व को पर्याप्त रूप से रेखांकित नहीं किया जा सकता। इन समितियों में ज्यादातर विधायी कार्य होते हैं और यह निश्चित रूप से अच्छा है। वास्तव में ये समितियां अक्सर प्रभावी होती हैं, जो कैमरे की चकाचौंध से दूर रहती हैं।


विभिन्न दलों के सांसदों को भी अक्सर विवादास्पद मुद्दों पर भी समझौते करने पड़ते हैं। उन्हें पार्टी लाइन पर सार्वजनिक स्टैंड लेने की जरूरत नहीं होती, जैसा कि संसद में होता है। लेकिन संसद के दोनों सदनों में बहस का अपना महत्व है, सिर्फ विधायिका में ही नहीं, बल्कि हमारे जैसे संसदीय लोकतंत्र में सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए भी। और उन मुद्दों को उठाने के लिए भी, जो लोगों को परेशान कर रहे हैं।


शैक्षणिक संस्थानों को ऑनलाइन कक्षाओं के संचालन के तरीके विकसित करने होंगे और यह सोचना शुरू करना होगा कि आदिवासी बच्चों जैसे बिना इंटरनेट और कंप्यूटर सुविधा वाले बच्चों को कैसे शिक्षा देनी है, ताकि वे वंचित न रह जाएं। हम अब नए कायदों के रूप में ई-कॉमर्स और डॉक्टरों से टेलीफोन पर परामर्श लेने लगे हैं।


हमें उन तरीकों को विकसित करना होगा, जिनसे संसद सामान्य रूप से कार्य करना शुरू करे, चाहे वह शारीरिक हो या डिजिटल रूप से, या दोनों के संयोजन से। चाहे चीन पर हो या महामारी पर फैसले लेकर ही हम दुनिया को और देश को अपना संदेश दे सकते हैं। और इसे बाद में करने के बजाय जल्द करने की जरूरत है। अब गेंद वैंकैया नायडू और ओम बिरला के पाले में है कि वे क्या फैसला लेते हैं!

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