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मुद्दा: स्कूलों की चौखट पर ठहरी गुणवत्ता, नीति आयोग की रिपोर्ट ने दिखाया दर्पण

कुमार सिद्धार्थ Published by: Pavan Updated Thu, 04 Jun 2026 06:54 AM IST

सार

नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, स्कूलों तक पहुंच की उपलब्धि अधूरी रह जाएगी, यदि कक्षाओं में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ।
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स्कूलों की चौखट पर ठहरी गुणवत्ता - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने स्कूलों तक पहुंच तो बढ़ाई है, पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की लड़ाई अब भी अधूरी है। आज शिक्षा महकमे में लगभग 14.7 लाख स्कूल, 24 करोड़ से अधिक विद्यार्थी और लगभग एक करोड़ शिक्षक हैं। पर, इतनी विशाल व्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन भवनों, योजनाओं या नामांकन से नहीं, बल्कि इस सवाल से होना चाहिए कि क्या बच्चे वास्तव में सीख पा रहे हैं?


रिपोर्ट बताती है कि देश में एक लाख से अधिक विद्यालय ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक हैं। वही बच्चों को पढ़ाने से लेकर उपस्थिति दर्ज करने, मध्याह्न भोजन की निगरानी, सरकारी पोर्टलों पर डाटा अपलोड करने और अन्य प्रशासनिक दायित्वों में भी व्यस्त रहते हैं। जब शिक्षक शिक्षा से इतर कार्यों में उलझ जाता है, तो ज्ञान के संवाद का कमजोर पड़ना स्वाभाविक है। ऐसे में, शिक्षा पाठ्यक्रम पूरा करने की प्रक्रिया बन जाती है, न कि सीखने की। रिपोर्ट के अनुसार, देश के लगभग 35 फीसदी विद्यालयों में 50 से कम विद्यार्थी हैं। इनमें से हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहां दस से भी कम बच्चे पढ़ते हैं। ऐसे में, यह सवाल उठता है कि इन स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण कैसे संभव होगा? ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में यह चुनौती और भी गहरी हो जाती है। कई स्थानों पर स्कूल भवन मौजूद हैं, पर प्रयोगशालाएं नहीं हैं, कंप्यूटर हैं, लेकिन इंटरनेट नहीं, पुस्तकालय हैं, किंतु नियमित पठन संस्कृति नहीं। शिक्षा का ढांचा तो खड़ा है, पर उसके भीतर सीखने की आत्मा अब भी कमजोर दिखाई देती है।


विगत वर्षों में असर (ऐन्युअल स्टेटस ऑफ एज्युकेशन रिपोर्ट), नेशनल अचीवमेंट सर्वे और हालिया राष्ट्रीय मूल्यांकनों ने बार-बार यही संकेत दिया है कि प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने और गणित की बुनियादी दक्षताएं चिंता का विषय बनी हुई हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट भी स्पष्ट करती है कि केवल नामांकन पर्याप्त नहीं है, बल्कि सीखना शिक्षा का असली पैमाना है। रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाती है-सरकारी स्कूलों में भरोसे का क्षरण। 2005 में जहां करीब 71 फीसदी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर 49.24 फीसदी रह गया। ग्रामीण परिवार, जो कभी सरकारी विद्यालय को स्वाभाविक विकल्प मानते थे, अब सीमित आय के बावजूद निजी स्कूलों की ओर देख रहे हैं। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि सरकारी स्कूल ही वे जगहें हैं, जहां विभिन्न असमानताओं के बीच लोकतांत्रिक सहअस्तित्व की पहली सीख मिलती है। इन पर भरोसा कम होने से शिक्षा के साथ लोकतंत्र की बुनियाद भी कमजोर होती है।


रिपोर्ट के अनुसार, प्राथमिक स्तर पर बच्चों को स्कूल तक लाने में सफलता तो मिली, पर माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 11 फीसदी से अधिक बताई गई है। जिला और ब्लॉक स्तर पर शैक्षिक नेतृत्व भी कमजोर है। रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में शिक्षकों की समयबद्ध नियुक्ति, छोटे स्कूलों का तर्कसंगत पुनर्गठन, स्कूल नेतृत्व को मजबूत करना, डिजिटल संसाधनों का प्रभावी उपयोग, सीखने के परिणामों की नियमित निगरानी और शिक्षकों के निरंतर प्रशिक्षण जैसे कदम महत्वपूर्ण हैं।


विडंबना यह है कि भारत में शिक्षा सुधार का संकट नीति का कम, क्रियान्वयन का अधिक रहा है। योजनाएं बनती हैं, बजट स्वीकृत होते हैं, लक्ष्य तय होते हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर असमान दिखाई देता है। शिक्षा में सुधार केवल नई योजनाओं से नहीं, बल्कि पुरानी योजनाओं के ईमानदार क्रियान्वयन से भी आएगा। नीति आयोग की रिपोर्ट दरअसल एक सामाजिक चेतावनी है कि अगर स्कूलों में सीखने की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ, तो स्कूलों तक पहुंच की हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि भी अधूरी रह जाएगी। इसलिए, आज शिक्षा के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं या नहीं, बल्कि यह है कि स्कूल पहुंचने के बाद क्या वे सचमुच सीख रहे हैं?

 
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