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सहमति-असहमति: यौन अपराधियों को सजा देने भर से नहीं बदलेगी तस्वीर, जरूरी है सोच में बदलाव

तस्लीमा नसरीन
Updated Fri, 30 Jun 2023 07:35 AM IST

सार

धर्म से लेकर समाज तक-सभी जगह पुरुषवाद का दबदबा है। ऐसे में,  स्त्रियों के अधिकार और उनकी इच्छा-अनिच्छा की परवाह करने का भला सवाल ही कहां उठता है! जब तक समाज का नजरिया स्त्रियों के प्रति नहीं बदलेगा, तब तक यौन अपराधियों को सिर्फ सजा देने से तस्वीर नहीं बदलने वाली।
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सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया


पुरुषवर्चस्ववादी समाज में सिर्फ पुरुष नहीं, बल्कि महिलाएं भी यह मानती हैं कि पतियों को पत्नी से शारीरिक संपर्क बनाने का अधिकार है और स्त्रियों को उनकी मांग माननी चाहिए। हमारे समाज की सोच यह भी है कि ऐसे मामलों में स्त्रियों की अपनी कोई इच्छा तो हो ही नहीं सकती, न होनी चाहिए। हां, स्त्री अगर उस पुरुष की पत्नी नहीं है, तो उसके विरोध करने का औचित्य है। लेकिन शारीरिक संपर्क के मामले में पत्नियों को अपने पतियों की मांग माननी ही चाहिए।


जबकि स्त्री की सहमति के बगैर हर शारीरिक संपर्क बलात्कार कहलाता है। जब किसी गैर पुरुष का किसी गैर महिला से शारीरिक संपर्क बनाना बलात्कार कहलाता है, तो पति-पत्नी के मामले में ऐसा क्यों नहीं होना चाहिए! क्या स्त्री की इच्छा-अनिच्छा, सहमति-असहमति का कोई मतलब नहीं है? क्या शादी हो जाने का अर्थ यह है कि स्त्री के शरीर और मन पर पुरुष का अधिकार हो गया है कि वह जब चाहे, उसे पीटे, और जबर्दस्ती उसके साथ शारीरिक संपर्क बनाए?


गौरतलब है कि पिछड़े देशों में पत्नी की सहमति के बगैर पति द्वारा जबरन यौन संबंध बनाना भले आपराधिक कृत्य न माना जाता हो, लेकिन सभ्य देशों में इस अपराध के लिए पतियों को जेल जाना पड़ता है। हालांकि काल के प्रवाह में अनेक पिछड़े देश अपने प्रतिगामी नियम-कानून और परंपराएं बदलते हैं तथा खुद को सभ्य देशों की श्रेणी में ले आते हैं। लेकिन कुछ पिछड़े देश ऐसे हैं, जो समय के अनुसार बदलना नहीं चाहते, जहां पुरुषों के सात खून माफ हैं। ऐसे देशों में पति को प्रभु या स्वामी तथा पत्नी को दासी माना जाता है। सिर्फ दासी नहीं, यौनदासी भी। यही कारण है कि मैरिटल रेप पर हमारे यहां बहुत गंभीरता से विचार ही नहीं किया जाता।


जाहिर है, जब पुरुषवादी समाज का बड़ा हिस्सा इसे अपराध ही नहीं मानेगा, तब इस पर गंभीरता से विचार करने का भला प्रश्न ही कहां उठता है! हद तो यह है कि मौजूदा 21वीं सदी में भी, जब आधुनिक और मानवतावादी विचारों ने पहले की बहुत सारी धारणाएं बदल दी हैं,  मैरिटल रेप को खासकर पिछड़े देशों में अपराध ही नहीं माना जाता। धर्म से लेकर समाज और कानून व्यवस्था-सभी जगह पुरुषवाद का दबदबा है। फिर नारियों के अधिकार और उनकी इच्छा-अनिच्छा की परवाह करने का सवाल ही कहां उठता है! भारतीय उपमहाद्वीप में स्त्रियों को बचपन से ही बता दिया जाता है कि उनका धर्म अपने पति की आज्ञा मानना है, उनके हुक्म का पालन करना है। परिवार के बड़े-बूढ़ों से लेकर धार्मिक शिक्षा और आचारशास्त्र लड़कियों को यही तो सिखाता-समझाता है, ताकि विवाह के बाद ससुराल जाने पर वे समुचित संस्कार का परिचय दें, पति की आज्ञा का पालन करें, अपनी इच्छा या अनिच्छा के बारे में न सोचें आदि-आदि।


एक कटु सच्चाई यह है कि पुरुषतांत्रिक समाज में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं होता। ऐसा समाज लंबे समय तक जड़ या स्थिर बना रहता है। इसी कारण यह देखने में आता है कि सातवीं शताब्दी में पुरुषतंत्र का चेहरा जैसा था, 21वीं शताब्दी में उसका चेहरा कमोबेश वैसा ही है, उसमें बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। पुरुष वर्चस्ववादी समाज में निरंतर अपराध हुए हैं। मौका मिलते ही हिंसा फैलाने में यह समाज पीछे नहीं हटा। यह समाज समान अधिकार की बात करना तो दूर, जो लोग इस दिशा में कदम उठाने की बात करते हैं, उन्हें निशाना बनाने में भी नहीं हिचकता। हैरानी की बात यह है कि मानवीयता और समान अधिकार जैसी विशेषताओं को सदियों से रोके रखने के बावजूद ऐसे समाज पर लोगों को हमलावर होते नहीं देखा जाता।


पुरुष वर्चस्ववादी व्यवस्था में यकीन करने वाले लोगों ने बार-बार यह प्रमाणित किया है कि उनके लिए पुरुष वर्चस्व ही सब कुछ है, स्त्रियों पर शारीरिक और यौन अत्याचार को वे सहज-स्वाभाविक मानते हैं। आज भी लड़कियों, स्त्रियों के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार करने वाले ताकतवर लोगों के बच निकलने, उनका बाल भी बांका न होने से यह स्पष्ट होता है। स्त्रियों के साथ होने वाले अपराधों में से ज्यादातर में देखा जाता है कि बात न करने, साथ न चलने या शारीरिक संपर्क के लिए राजी न होने पर उनका खून कर दिया जाता है या उनके चेहरे पर तेजाब डाल दिया जाता है। इस स्थिति में बदलाव क्या संभव है? पिछड़े देशों और समाजों में स्त्रियों की सहमति-असहमति को महत्व देने और उन्हें इंसान समझने का दौर क्या कभी नहीं आएगा? अगर यही स्थिति जारी रहने वाली है, तो वह मनुष्यता के लिए निश्चय ही बड़ी हताशा होगी। लेकिन पुरुष वर्चस्ववादी समाज में ऐसे पुरुष भी तो हैं, जिनके लिए स्त्री की सहमति-असहमति और उनकी संवेदनाएं महत्व रखती हैं, जो पुरुष वर्चस्व से नहीं, बल्कि बुद्धि-विवेक और संवेदनाओं से संचालित होते हैं। लेकिन मुझे नहीं मालूम कि ऐसे पुरुष किन गुफाओं में छिपे रहते हैं, जो अमानवीय और समान अधिकार की विरोधी पुरुषतांत्रिक व्यवस्था का विरोध करने के लिए खड़े नहीं होते।
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जाहिर है, स्त्रियों पर अत्याचार करने वालों को सिर्फ सजा देने से काम नहीं चलने वाला। हमने देखा है कि कठोर से कठोर सजा भी स्त्रियों पर होने वाले अपराधों को कम करने का कारण नहीं बन सकी है। स्त्रियों पर अपराध होते हैं, क्योंकि पुरुषतांत्रिक समाज एक तरह से इसे अपना अधिकार मानता है। लिहाजा जब तक हमारा समाज नहीं बदलेगा, जब तक वह स्त्रियों की इच्छा-अनिच्छा को महत्व नहीं देगा, तब तक सुखद परिवर्तन संभव नहीं है।

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