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विमर्श: समय का पाबंद होना अच्छा, लेकिन घड़ी के चक्कर में जिंदगी न फिसल जाए

एमिली लेबर-वॉरेन, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Sun, 03 Aug 2025 05:46 AM IST

सार

समय का पाबंद होना अच्छा है, लेकिन हर स्थिति में घड़ी की सुइयों पर जीवन चलाने की सनक कभी-कभी घातक भी हो सकती है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Adobe Stock


1950 के दशक में, मानवविज्ञानी एडवर्ड टी. हॉल ने समय प्रबंधन के प्रति अलग-अलग सांस्कृतिक नजरियों को दर्शाने के लिए ‘मोनोक्रोनिक’ और ‘पॉलीक्रोनिक’ शब्द गढ़े थे। उत्तरी यूरोप और अमेरिका में, जिन्हें डॉ. हॉल ने ‘मोनोक्रोनिक’ समाज कहा था, लोग समय-सीमा पर जोर देते थे और क्रमवार काम करते थे, एक काम पूरा करने के बाद ही अगला काम शुरू करते थे।


लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और पश्चिम एशिया में, जिसे  ‘पॉलीक्रोनिक’ समाज बताया, उन्होंने देखा कि लोग काम के बीच में ही मन बदल लेते थे और तय शेड्यूल पर टिके रहने को लेकर उतने दृढ़ नहीं थे। इसके अलावा लोगों की व्यक्तिगत समय-उपयोग की शैलियां भी काफी भिन्न होती हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि समय के साथ अपने रिश्ते के बारे में भी जागरूक होने से जीवन आसान हो सकता है और आपको अपने आस-पास के लोगों के साथ विवादों को सुलझाने में मदद मिल सकती है। 


ऑस्टिन स्थित टेक्सास विश्वविद्यालय की क्रोनोमिक्स विशेषज्ञ डॉना बैलार्ड कहती हैं, जो लोग अपने समय को पहले से तय कार्यों की एक शृंखला के रूप में प्रबंधित करते हैं, वे आमतौर पर समय के हिसाब से जीते हैं और काम के घंटों के दौरान, रिश्तों के ऊपर दायित्वों को प्राथमिकता देने के लिए तैयार रहते हैं। ऐसे व्यक्ति के लिए व्यवधान परेशान करने वाला होता है। पॉलीक्रोनिक लोग उन अनुभवों और रिश्तों को प्राथमिकता देते हैं, जो हमेशा पूर्व-निर्धारित कार्यक्रमों में ठीक से फिट नहीं बैठते। हर समय-शैली के अपने फायदे और नुकसान होते हैं। जो लोग आसानी से कामों के बीच बदलाव कर लेते हैं, उन्हें जिंदगी की उलझनों से निपटने में भी फायदा होता है।

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