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पंजाब में फिर आतंकवाद की दस्तक

अजय साहनी Updated Mon, 19 Nov 2018 07:07 PM IST
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पंजाब पुलिस

अमृतसर जिले के राजासांसी क्षेत्र के आदिवाल गांव में स्थित निरंकारी भवन में रविवार को हुए ग्रेनेड धमाके का संबंध संभावित रूप से खालिस्तानी आतंकवाद से है। जब से पंजाब में आतंकवाद को पराजय का सामना करना पड़ा है, तभी से लगातार एक कोशिश जारी है कि किसी न किसी तरीके से वहां आतंकवाद को दोबारा को जिंदा किया जाए। इस षड्यंत्र को पाकिस्तान से लगातार समर्थन मिलता रहा है और विदेशों में रहने वाले सिख समुदाय के लोगों का कट्टरपंथी तबका इसमें लगा रहता है। हालांकि ये लोग बीच-बीच में एकाध घटनाओं को ही अंजाम दे पाते हैं। अभी 2016-17 में पंजाब के विभिन्न इलाकों में अलग-अलग समय जिन आठ लोगों को निशाना बनाकर हत्या की गई थी, उसमें विदेशों में रहने वाले सिखों की संलिप्तता थी, संसाधन और पैसा भी वहीं से आया था। विदेशों में जो कट्टरपंथी सिख लोग हैं, उन्हें पाकिस्तान से लगातार समर्थन मिलता है। तो यह निरंतर जारी एक सिलसिला है। हमारी पुलिस और खुफिया विभाग के लोग इस पर काफी हद तक काबू रखते हैं। कुछ साजिशों को समय रहतेे ही बेअसर कर दिया जाता है। साजिशों में शामिल कुछ लोगों को पकड़ा भी गया है। जैसे आठ लोगों की जो हत्या हुई, उनमें शामिल कुछ कातिलों और षड्यंत्रकारियों को भी पकड़ा गया, जो ब्रिटेन से आए थे और उसमें जो पूरा नेटवर्क लगा था, उसकी पहचान कर ली गई। अंतरराष्ट्रीय सहयोग तो ऐसे मामलों में बहुत कम ही मिल पाता है, लेकिन डॉक्यूमेंटेशन और दबाव बनाने की कोशिश जारी है।



अमृतसर में हुई घटना को कुछ लोग इस्लामिक स्टेट और जैश-ए मोहम्मद से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस बात की आशंका ज्यादा है कि इसमें भी जांच के बाद खालिस्तानी तत्वों की संलिप्तता ही मिले। और मुझे लगता है कि इसमें शामिल लोगों का भी संबंध विदेशों में रहने वाले कट्टरपंथियों से ही होगा। कुछ लोग यह कयास लगा रहे हैं कि इसमें जाकिर मूसा या जैश-ए मोहम्मद या इस्लामिक स्टेट का हाथ है। मेरा मानना है कि ये बेबुनियाद कयासबाजी है। बेशक जांच सभी पहलू से होनी चाहिए, लेकिन जांच से पहले बयानबाजी करना गलत है।

 

जाकिर मूसा तो खुद ही कश्मीर से भागा हुआ है। अगर वह अपनी शहादत चाहता है, तो कश्मीर में कुछ करेगा, पंजाब में क्यों करेगा? निरंकारियों को मारकर उसे क्या मिलेगा? उसकी लड़ाई तो कश्मीर को लेकर है! और जैश-ए मोहम्मद निरंकारी को अपना निशाना क्यों बनाएगा? वह किसी सरकारी प्रतिष्ठान या पुलिस पर हमला जरूर कर सकता है। हां, कोई मुस्लिम संगठन खुद को खालिस्तानी दिखाकर हमला कर सकता है, ताकि झगड़ा शुरू हो, तो अलग बात है। लेकिन कोई खुद को जैश-ए मोहम्मद बताकर निरंकारियों पर हमला करके क्या हासिल करेगा? इससे पंजाब में अराजकता नहीं फैलेगी। इसलिए हादसा होते ही यह कयास लगाना ठीक नहीं कि इसने किया, उसने किया। जांच हो रही है, जांच की रिपोर्ट आने दीजिए। पंजाब में संघर्ष का इतिहास है, उसे समझना चाहिए। अभी हमारा राजनीतिक माहौल ऐसा है कि हर चीज को इस नजरिये से देखा जाता है कि उसमें पाकिस्तान और मुसलमान का एंगल जरूर हो। यह विकृत राजनीतिक सोच है, जो वोट पाने के लिए समाज को बांटने का काम कर रही है। इस्लामिक स्टेट पर भी शक करना अभी ठीक नहीं होगा। 2014 में ही इस्लामिक स्टेट ने बयान दिया था कि भारत हमारे खुरासान का हिस्सा है और वहां जेहाद होना चाहिए, लेकिन उसने इन चार साल में क्या कर लिया? मध्य प्रदेश में एक रेल में विस्फोट की घटना में ही उसका नाम आया था, जिसमें किसी की मौत नहीं हुई थी, कुछ लोग घायल हुए थे। आईएस तो खुद सीरिया और इराक में मर रहे हैं, वे यहां क्या दहशतगर्दी फैलाएंगे!


अब सवाल उठता है कि निरंकारी भवन को ही क्यों निशाना बनाया गया। इसके लिए हमें अतीत की तरफ झांकना होगा। खालिस्तानी आंदोलन की बुनियाद में अकाली-निरंकारी संघर्ष ही था। अकालियों में जो कट्टरपंथी तत्व हैं, वे निरंकारियों को ईशनिंदा का दोषी मानते हैं। उनका कहना है कि ये गलत सिखी का प्रचार करते हैं। ये लोग निरंकारियों पर सिख धर्म को विकृत करने का इल्जाम लगाते हैं। ये तो निरंकारियों को सिख ही नहीं मानते। 1988-89 में जब खालिस्तानी आतंकवाद शुरू हुआ था और भिंडरांवाले उभरकर आए थे, तो वह दमदमी टकसाल और निरंकारियों के बीच के झगड़े की वजह से ही उभरकर सामने आए थे। सबसे पहले तो भिंडरांवाले एक निरंकारी बैठक में हथियार लेकर गए थे और निरंकारी गुरु को मारने की कोशिश की थी, लेकिन उसमें भिंडरांवाले के ही कुछ लोग मारे गए थे। उसके बाद भिंडरांवाले ने निरंकारी बाबा की हत्या करवा दी थी और वहीं से खालिस्तानी आतंकवाद की शुरुआत हुई थी। तो कहने का मतलब यह कि खालिस्तानी और निरंकारी के बीच बहुत पुराना झगड़ा है और इस घटना का मकसद खालिस्तानी आतंकवाद को फिर से जीवित करना है। इसलिए यह घटना महत्वपूर्ण है, और हमारी सुरक्षा एजेंसियों को इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। हमला करने वालों का यही मकसद रहा होगा कि अगर हम निरंकारियों पर हमला करेंगे, तो कुछ और लोग, जो निरंकारी को सिख धर्म के खिलाफ मानते हैं, हमारे साथ जुड़ जाएं।

 

जाहिर है, यह खुफिया विफलता है, लेकिन यह सामान्य विफलता है। ऐसा नहीं है कि इस घटना के बारे में खुफिया एजेंसियों या पुलिस बल के पास कोई खास जानकारी थी और उन्होंने रोकने के लिए कदम नहीं उठाया। पंजाब में कोई आतंकी वारदात हो सकती है, यह सूचना थी, लेकिन कहां, कैसे, कब-इस संबंध में कोई विशिष्ट जानकारी नहीं थी। ऐसे में सीमित कार्यबल और क्षमता के साथ पुलिस या खुफिया एजेंसी क्या कर सकती है? जरूरत इस बात की है कि पुलिस और खुफिया एजेंसियों की क्षमता बढ़ाई जाए और उन्हें अत्याधुनिक तकनीक एवं प्रशिक्षण दिया जाए। हमारे यहां पुलिस एवं खुफिया एजेंसी में क्षमता निर्माण पर बहुत कम खर्च किया जाता है। जो पुलिस सामान्य अपराधी पर अंकुश लगाने में सक्षम नहीं है, वह आतंकवादियों पर कैसे अंकुश लगा पाएगी? अमृतसर की घटना को एक चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए और उसके अनुसार भावी खतरों से निपटने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। 

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