शब्द बेचारे अपने प्रयोक्ता की नीयत से जुड़े होते हैं। यह उपयोग देश, काल के साथ बदलता रहता है और इस प्रक्रिया में शब्द अपनी क्षमता खोते और पाते रहते हैं। इस दृष्टि से ‘धर्म’ शब्द का बड़ा ही समृद्ध इतिहास है। धर्म के व्यापक विचार में भौतिक जीवन की समृद्धि से लेकर मोक्ष तक विस्तृत कल्याण की बात शामिल है। परंतु आज उसका इतना सरलीकरण हो गया है कि उसे तमाम निरर्थक चमत्कारी कार्यों, जिसमें गंडा-ताबीज बंधवाने, मंदिर जाने, नदी में स्नान करने, बाबा/फकीर/मुल्ला की वंदना करने, किसी स्थान या वृक्ष या मूर्ति की अभ्यर्थना करने, परिक्रमा करने, टोटके करने आदि से जोड़ दिया गया है। धर्म आज जादुई असर वाले अज्ञात, अज्ञेय और विचित्र का पर्याय-सा हो गया है।
केवल अपढ़ नहीं, पढ़े-लिखे तथाकथित दृष्टि संपन्न वैज्ञानिक लोगों में भी धर्म का यह रूप लोकप्रिय हो रहा है। धर्म को वे एक व्यायाम या कवायद की तरह लेते हैं और अनुष्ठान के रूप में ही वह प्रयुक्त हो रहा है। 'धर्म’ की यह आधुनिक प्रवृत्ति समाज में भ्रष्टाचार, अत्याचार और अनाचार की वृद्धि के साथ सीधे-सीधे जुड़ी हुई है। इससे धर्म की गरिमा घटती है। धर्म की सत्ता निरपेक्ष नहीं होती। उसके अंतर्गत हर एक व्यक्ति का उसकी परिस्थिति के सापेक्ष व्यवहार का विधान किया गया है। गुरु के निकट अपना अध्ययन पूरा करने के बाद विद्यार्थी को आचार्य धर्माचरण का उपदेश देता था। वास्तविक धर्म सामाजिक जीवन में व्यवस्था स्थापित करता है। भगवद्गीता में धर्म की कमी (ग्लानि) को भगवान के अवतरण का एक प्रमुख कारण कहा गया है और धर्म की स्थापना करने के लिए कृष्ण युग-युग में आने को तैयार हैं।
धर्म जितना निजी अनुभव का प्रश्न है, उससे अधिक सामाजिक संस्था भी है। आज के समय में धर्म का संस्थागत रूप बड़ा प्रबल हो रहा है। निजी अनुभव की दुनिया से अलग हटकर संस्था का रूप लेते ही धर्म शासन जैसा बनने लगता है और शासन की हर खूबियां और बुराइयां भी आने लगती हैं। आज धन का लेन-देन और उसकी व्यवस्था करना हर धर्म के बड़े या लोकप्रिय आस्था केंद्र का मुख्य कार्य हो गया है। बहुत-सा धन मंदिरों आदि में बिना उपयोग के पड़ा हुआ है। धर्म को संस्था का रूप देने पर बहुत से नए पहलू भी जुड़ जाते हैं। धर्म जो मुक्ति का वास्ता देकर खड़ा हुआ, खुद अनचाहे बंधनों में बंधता-बांधता चला गया। धर्म की प्रभाव शक्ति का अनुमान लगाकर उसे अपने अनुकूल बनाकर चतुर सुजान अपने हित में काम में लाते हैं। वे धर्म संस्थान के और उससे जुड़े रीति-रिवाजों, अभ्यासों और तकनीकी को अपनाकर या दिखाकर अपनी नई पहचान प्राप्त करते हैं। धार्मिक आस्था का व्यापारीकरण बड़ी तेजी से हो रहा है। संस्था का रूप बड़ा होने के साथ उससे जुड़े लोगों की जरूरतें भी बढ़ती हैं और उनकी महत्वाकांक्षाएं अपनी दुनिया बसाती हैं।
कभी भारत की संस्कृति अंदर और बाहर, दोनों के अनुकूल थी और भारत समृद्ध देश था। पिछली कुछ सदियों में बड़ी गिरावट आई। अब लोग आध्यात्मिक कम, अध्यात्मवादी ज्यादा हो चले हैं। अध्यात्म और धर्म अंत:करण से जुड़े विषय हैं। बाहर का अध्यात्म और धर्म झगड़ा कर रहे हैं, अंदर से खोखले होते जा रहे हैं।
हम अपने अंदर और बाहर, दोनों को संभालने में विफल हो रहे हैं। हम धर्म का उपयोग बेहद संकुचित अर्थ में करने लगे हैं। जबकि उसके भौतिक सतही रूपों में उलझने की जगह धर्म की मूल भावना का पोषण करना होगा।