हमारे धर्मग्रंथों और नीतिशास्त्रों में सेवा-परोपकार की महिमा का खूब बखान किया गया है। बताया गया है कि अगर कोई व्यक्ति दूसरे के दुख-दर्द को अपना मानता है और उसकी सेवा-सहायता में जीवन बिताता है, तो उसे स्वतः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
ऐसे ही संत थे, महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी, जो अपने इष्टदेव श्रीनाथ जी के विग्रह को प्रतिदिन खाद्य व्यंजनों का भोग लगाने के बाद ही उनकी जूठन के रूप में प्रसाद (भोजन) ग्रहण करते थे।
खाद्य पदार्थों का अभाव हो जाने पर उन्होंने पूजा के स्वर्ण पात्र बेचकर भोज्य पदार्थों की व्यवस्था करने को कहा। स्वर्ण पात्र की बिक्री से प्राप्त धन से सामान खरीदकर भगवान के लिए प्रसाद तैयार किया गया। भगवान श्रीनाथ जी का भोग लगाकर भक्तजनों ने केले के पत्ते पर प्रसाद परोसा तथा महाप्रभु से ग्रहण करने की प्रार्थना की।
महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने उत्तर दिया, यह प्रसाद मंदिर के स्वर्णपात्र के बदले मिले धन से तैयार किया गया है। भगवान तो यह प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं, किंतु मंदिर की संपत्ति (स्वर्णपात्र) से प्राप्त खाद्यान्न से बनाया गया प्रसाद मैं कदापि ग्रहण नहीं कर सकता।
आचार्य ने अपने भक्तों को प्रेरणा देते हुए कहा, मठ-मंदिरों के एक-एक पैसे का सेवा-परोपकार में सदुपयोग होना चाहिए। भगवद्-द्रव्य का व्यक्तिगत सुख-सुविधा के लिए उपयोग करने वाले का नाश हो जाता है, इसे नहीं भूलना चाहिए।