शासक को झकझोरने के लिए अपने देश में दो ही कारगर तरीके हैं। पहला राष्ट्रपिता की देन अनशन और दूसरा आजाद हिंदुस्तान की उपज-भारत-बंद। अनशन में थोड़ा जोखिम है।
इससे सेहत को तो खतरा है ही, तोड़-फोड़ की गुंजाइश भी नहीं। पिछले दिनों एक नई प्रतिभा का अनशन जब हाशिये पर चला गया, तब लगा कि बंद इससे बेहतर हथियार होता है। पानी-बिजली के लिए करते रहो अनशन, (महा) राष्ट्र के मंत्री तक इसकी खिल्ली उड़ाते हैं।
इसके बरक्स बीते दिनों जब दो दिनों का भारत बंद हुआ, तब लगा कि गाहे-बगाहे बंद की खुराक लेना देश की सेहत के लिए जरूरी है। चरैवेति-चरैवेति संत-समाज को ही शोभायमान होता है।
नान-स्टॉप काम करते हुए बोरियत हो जाती है। कुछ तोड़ने, फोड़ने, जलाने, फूंकने को न मिले, तब भी बोर होने लगती है तबियत।
‘आंसू न बहा, फरियाद न कर’ टाइप पब्लिक के लिए कुछ ऐसा होते रहना चाहिए, ताकि यह एहसास बना रहे कि हम आजाद हैं, सरकारी बस जला सकते हैं, दुकानें फूंक सकते हैं।
हड़ताल ठहरी इसकी कजिन, जो भूख और फैक्टरी के साथ ही भली लगती है। बंद में हड़ताल जैसी खुरखुराहट नहीं, एक ध्वन्यात्मक लालित्य है।
बंद का वैसे तो अर्थ रुक जाना होता है। लिखने वाली कलम का रुकना कलम-बंद, जुबान का राधा न बोले-न बोले-न बोले की गति प्राप्त होना, जुबान बंद।
दिल धड़कना बंद कर दे, तो राम नाम सत्य का बोध। पर जब भारत बंद होता है, तब असामाजिक शक्तियां घनघोर ढंग से सक्रिय हो जाती हैं। ऐसे में जान-माल के साथ ही सरकारी और निजी गाड़ियों का राम नाम सत्य हो जाता है।
एक धार्मिक टाइप का बंद भी होता है। मसलन, प्रभु जब शयन करते हैं, तब उनको शादी-ब्याह और अन्य पुनीत कार्य का हंगामा पसंद नहीं।
देव–काज जरूर बंद हो जाते हैं, जारी रहते हैं कष्ट और अन्याय। लेकिन जब-जब भारत बंद होता है थम जाती है जिंदगी और खुल जाती है समस्याओं की दुकान। बैठे रहो होल्डाल लिए स्टेशन पर। नहीं पसीजता टैक्सी या ऑटो वाले का दिल।
बंद कराने वाले इन बंदों को कोई यह क्यों नहीं समझाता-अरे अक्ल के अंधो! हाथ में डंडे और झंडे लेकर महंगे डीजल-पेट्रोल फूंक दूकान-प्रतिष्ठान बंद करवा जिसके खिलाफ शक्ति प्रदर्शन कर रहे हो, वह आम आदमी तो ऑलरेडी अपनी जुबान बंद किए हुए है।