नरेंद्र मोदी ने एक बात कही पिछले सप्ताह, जिसकी अहमियत शायद हम ही लोग समझ सकते हैं, जिन्हें याद है 'गरीबी हटाओ' का वह पुराना नारा, इंदिरा गांधी का वह बीता जमाना। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए अपने पहले इंटरव्यू में कहा, कांग्रेस के साठ वर्षों के राज में देश के गरीब या तो उतने ही गरीब रहे, जितने थे या उससे भी अधिक गरीब हो गए।
इन शब्दों को पढ़कर मेरे कानों में गूंजने लगा वह पुराना नारा, वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ। इस नारे ने इंदिरा गांधी को बीती सदी के सत्तर के दशक में गरीबों की देवी बना दिया था। इंदिरा जी ने अपने इस रूप को बड़ी चतुराई से जीवित रखा। ग्रामीण क्षेत्रों में तकरीबन जितनी भी गरीबी हटाने वाली योजनाएं थीं, उनके साथ या तो अपना नाम चिपका देती थी या अपने पिताजी का नाम। उस समय ज्यादातर लोग अशिक्षित या अर्धशिक्षित हुआ करते थे, सो मान लिया करते थे कि इंदिरा आवास योजना के तहत जो मकान उन्हें मिले थे, इंदिरा जी ने अपने पैसे से उनके लिए बनवाए थे। मगर गरीबी ग्रामीण भारत में न उस समय कम हुई थी और न ही पिछले दशक में, जब इंदिरा जी की बहू ने वही नीतियां अपनाई थीं। साथ-साथ सोनिया गांधी ने वही गलतियां भी कीं, जो इंदिरा जी ने की थीं। गरीबी हटाने के वे औजार नहीं दिए गरीबों को, जिनके बिना कहीं भी गरीबी कभी नहीं हटती है। ये औजार हैं-अच्छे स्कूल, अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं, अच्छी सड़कें, भरोसेमंद बिजली और साफ पानी।
चीन और दक्षिण पूर्वी देश अगर आज भारत से आगे निकल गए हैं, तो सिर्फ इसलिए कि उन देशों के शासकों ने इन सुविधाओं पर खास ध्यान दिया है। इसका एक बेहतर उदाहरण थाईलैंड है, जहां मैं पंद्रह वर्षों से समंदर किनारे हुआ हिन नाम के एक शहर में हर वर्ष एक स्वास्थ्य केंद्र में आराम करने जाती रही हूं। पहली बार जब हुआ हिन गई थी 1999 में, तो वह एक छोटा-सा मछुआरों का गांव था, जिसमें पुराने किस्म के बाजार थे, एक-दो मामूली से होटल, और था नरेश का एक छोटा महल, जो संग्रहालय में तब्दील हो चुका था। मगर आज वह एक आधुनिक शहर बन गया है, जहां दूर-दराज के देशों से पर्यटक आते हैं। विदेशी पर्यटक वहां जाते हैं, जहां बिजली, पानी, सेलफोन, सड़कें और अन्य आधुनिक सुविधाएं होती हैं। ये वही औजार हैं, जिनसे गरीबी मिटती है। सवाल यही है कि हमारे 'गरीबनवाज' शासकों ने ये औजार गरीबों को क्यों नहीं दिए।
गरीबी हटाने के नाम पर हमारी सरकारों ने पिछले सड़सठ वर्षों में लाखों-करोड़ों रुपये कई किस्म की योजनाओं में खर्च किए हैं। मनमोहन सरकार के दौरान ही इतनी सारी योजनाएं बनी हैं गरीबों के नाम पर कि हिसाब लगाना मुश्किल हो जाता है। पिछले साल जब लोकसभा चुनाव अभियान में ग्रामीण उत्तर प्रदेश के अति पिछड़े इलाकों में घूमने गई थी, तो सबसे बड़ा फर्क यही नजर आया कि जनता अब समझने लगी है कि गरीबी हटाने के नाम पर उनके साथ दशकों से ढोंग रचा गया है। यह समझदारी आम लोगों को सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि सेलफोन और टीवी से मिली है। सो मोदी ने जब परिवर्तन और विकास की बातें कीं, तो उनको बहुत अच्छी लगीं, लेकिन मोदी को भी भूलना नहीं चाहिए कि अगर आम आदमी के जीवन में परिवर्तन और विकास लाने में वह अगले चार वर्षों में सफल नहीं होते हैं, तो उन्हें दूसरा मौका नहीं मिलेगा। देश के लोग समझदार भी हो गए हैं और बेसब्र भी।