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दलित हित का छद्म

Thu, 28 Nov 2013 08:14 PM IST
सुभाष गाताडे
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उत्तर प्रदेश में सत्तासीन समाजवादी पार्टी की सरकार अब दलितों को आकर्षित करने की, खासकर वाल्मीकि समाज को रिझाने की कोशिश कर रही है। पिछले दिनों राजधानी लखनऊ में आयोजित ‘सफाई मजदूर’ रैली में इस बात का विधिवत ऐलान भी किया गया, जिसके अंतर्गत मुख्यमंत्री ने सफाई कर्मचारियों के चालीस हजार पद भरने और उनकी समस्याओं पर गौर करने के लिए एक विशेष अधिकार प्राप्त कमेटी बनाने का ऐलान किया। रैली में यह भी बताया गया कि अब अगर कोई सफाई कामगार काम के दौरान काल-कवलित होता है, तो उसे पांच लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा।
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कुछ वर्ष पूर्व मायावती के नेतृत्व वाली बसपा सरकार ने भी वाल्मीकि समाज को रिझाने की ऐसी ही कोशिश की थी। तब खासतौर से ग्रामीण क्षेत्र में इस समुदाय के लिए एक लाख स्थायी नौकरियां देने की घोषणा की गई थी। यह विडंबना ही है कि उस वक्त किसी ने सवाल नहीं उठाया कि सफाई का काम एक समुदाय के लिए आरक्षित करना, जो उसी पेशे के चलते लंबे समय से वर्ण समाज के हाथों प्रताड़ना और भेदभाव का शिकार होता रहा है, आखिर किस मायने में ऐतिहासिक कहा जा सकता है। और न ही अब यह पूछा जा रहा है कि चंद हजार नौकरियां इस तबके के लिए देना, क्या एक तरह से जन्म पर आधारित उसी व्यवस्था को मजबूत करने का काम नहीं है, जिसका कहर अनुसूचित जातियों, खासकर वाल्मीकि समाज पर बरसता रहा है।

दरअसल इस बात को रेखांकित करने की जरूरत है कि आजादी के 66 वर्ष बाद भी आठ लाख से अधिक लोग (जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं) संविधान द्वारा लगाई गई पाबंदी के बावजूद सिर पर मैला ढोते रहे हैं या हर साल 28 हजार से अधिक लोग सीवर में जहरीली गैस से मरते हैं, और इस काम में अनुसूचित जातियों के लोग ही अधिकतर लगे हैं।
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मार्च, 1927 में डा. अंबेडकर की अगुवाई में ऐतिहासिक महार सत्याग्रह हुआ था। उसका जो घोषणापत्र जारी किया गया था, उसमें उन्होंने कहा था: ‘तीन चीजों का तुम्हें परित्याग करना होगा। उन कथित गंदे पेशों को छोड़ना होगा, जिनके कारण तुम पर लांछन लगाए जाते हैं। दूसरे, मरे हुए जानवरों का मांस खाने की परंपरा को भी छोड़ना होगा। और सबसे अहम है कि तुम उस मानसिकता से मुक्त हो जाओ कि तुम ‘अस्पृश्य’ हो।’ बाद के दिनों में जो सामाजिक आंदोलन विकसित हुए, उसमें आंदोलन के एक तरीके के तौर पर इस रूप को भी अपनाया गया, जहां लाखों की तादाद में दलितों ने उन पेशों का परित्याग किया, जिसकी वजह से उन पर लांछन लगता था। डॉ अंबेडकर के आंदोलन का नारा (शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो) बनकर जो विकसित हुआ, उस पर गौर करने से यह बात अधिक स्पष्ट हो जाती है।

पिछले दिनों सफाई के पेशे में लिप्त स्वच्छकार समुदाय के युवाओं की तरफ से कई स्थानों से यह खबर आई थी कि उन्होंने ‘झाडू छोड़ो, कलम उठाओ’ का नारा दिया था। हालांकि इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि यह मुहिम स्वच्छकार समुदाय में अब भी बहुत जोर नहीं पकड़ सकी है और समुदाय का अच्छा खासा हिस्सा उसी पेशे में लिप्त है।

अनुसूचित जातियों के लिए उन्हीं पेशों को आरक्षित करने की समझदारी रखने में सपा-बसपा कोई अपवाद नहीं है। सत्ता की राजनीति में मुब्तिला सभी दल इसी चिंतन के वाहक हैं। यह अकारण नहीं कि कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूपीए गठबंधन की सरकार के पहले संस्करण में अनुसूचित जाति और जनजातियों के कल्याण से संबंधित केंद्रीय विद्यालय संगठन और नवोदय विद्यालय की कमेटी द्वारा संसद में पेश सिफारिशें इसी बात की ताकीद कर रही थीं। इसमें कहा गया था कि केंद्रीय विद्यालयों और उसके कार्यालयों के लिए जरूरी सफाई कर्मचारी अनुसूचित जाति और जनजातियों की श्रेणी से ही भर्ती किए जाएंगे।

दिलचस्प था कि कि उन्हीं दिनों कांग्रेस के नेतृत्ववाली हरियाणा सरकार ने दलित उत्थान को लेकर जो विज्ञापन प्रकाशित किया था, उसमें इसी बात को रेखांकित किया था कि ‘दलितों के लिए एक सुनहरा अवसर कि ग्यारह हजार सफाई कर्मचारी अनुसूचित जातियों से ही भर्ती किए जाएंगे।’
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