गौरतलब है कि लंबे समय से चीन के ग्रामीण इलाके पिछड़ेपन और कठिनाई भरे जीवन के प्रतीक माने जाते रहे हैं। माओ की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान लोगों को जबरन गांवों में भेजा जाता था, जिससे शहरी लोग गांवों को नापसंद करने लगे थे। फिर 1950 में चीन में हुकोऊ व्यवस्था लागू हुई, जिसके तहत लोगों को अपने जन्मस्थान के बारे में बताना पड़ता था। उस दौरान शहरी और ग्रामीण जीवन के बीच दरार और बढ़ गई। देंग श्याओपिंग के समय चीन की आर्थिक क्रांति शहर केंद्रित थी। उस दौरान चीन के गांव और पिछड़ते चले गए। तब लाखों चीनी गांव छोड़कर शहर चले गए। वह सिलसिला आज भी जारी है। वर्ष 1980 में 17 फीसदी आबादी शहरों में रहती थी। वर्ष 2023 में यह आंकड़ा बढ़कर 66 प्रतिशत हो गया।
इसके बावजूद पिछले करीब दो दशकों से चीन के ग्रामीण इलाकों में बदलाव की लहर चल पड़ी है। वर्ष 2006 में कृषि कर खत्म कर दिया गया, जिससे ग्रामीण इलाकों में समृद्धि आने लगी। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हाल ही में ग्रामीण सशक्तीकरण कार्यक्रम शुरू किया है। इसके तहत खेती में इंटरनेट के प्रयोग और ताओबाओ विलेजेस जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म ने ग्रामीण इलाकों को शहरों से जोड़ दिया है।
हालांकि अब भी गांव और शहरों की आय में भारी फर्क बरकरार है। गांव में प्रति व्यक्ति आय शहरों की तुलना में आधे से भी कम लगभग, 40 फीसदी है। इसके बावजूद ग्रामीण चीन में आ रहा बदलाव देखने लायक है। सिस्टर यू के यूट्यूब चैनल के 2.3 करोड़ फॉलोअर्स हैं। अपने चैनल में वह पूर्वोत्तर चीन के ग्रामीण इलाकों के स्वादिष्ट भोजन और खाने-पीने की विविधता के बारे में बताती हैं। कोविड के बाद आर्थिक बदहाली और शहरों में बढ़ती बेरोजगारी के बीच उभर रहे गांव ही इन दिनों चीन में आकर्षण के नए केंद्र हैं। -मिचेल गैलेर (द कन्वर्सेशन से)