एक राष्ट्र के तौर पर यह खुशी की बात हो सकती है कि राष्ट्रीय पशु बाघ के संरक्षण के हमारे प्रयास अब रंग ला रहे हैं। ताजा गणना के मुताबिक, हमारे देश में पिछले चार वर्षों में बाघों की संख्या में 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और अब उसकी संख्या 2,226 हो गई है, जो वर्ष 2010 में मात्र 1,706 रह गई थी। यह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है कि दुनिया में बाघों की कुल आबादी का 70 प्रतिशत हिस्सा हमारे देश में है।
लेकिन बाघों की इस बढ़ी हुई संख्या से उन लोगों को शायद ही खुशी होगी, जो आए दिन बाघों या अन्य वन्य पशुओं के शिकार होते हैं या जिनकी संतानों और फसलों को वन्य जीव नुकसान पहुंचाते हैं। आज अपने देश का ऐसा कोई भी कोना नहीं है, जहां आदमी और जानवर आपस में न भिड़ रहे हों। आदमी वन्य-जीवों को मारने पर उतारू है, तो वन्य-जीव आदमी को। पहले आदमी और जानवरों की मुठभेड़ की घटनाएं ग्रामीण इलाकों तक सीमित थीं, पर अब इसका दायरा बढ़ गया है। आए दिन शहरी इलाकों में बाघ की ही प्रजाति के तेंदुए के घरों में घुसने और लोगों को नुकसान पहुंचाने की खबरें सुनने को मिलती हैं।
जानवर तथा लोगों के बीच बढ़ती दुश्मनी दोनों के लिए हानिकारक है। शुरूआती दौर में जानवर घर, गांव, खेती के दुश्मन बने और हालात इतनी गंभीर हो गई कि कई गांवों में तो लोगों ने खेती ही छोड़ दी, तो कइयों ने फसलें बदल लीं। पहाड़ हो या फिर मैदान, कई इलाकों में वन्य जीवों द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाने के चलते किसानों को मजबूरीवश फसल बदलने पड़े। मसलन, उत्तर प्रदेश के कई इलाको में सरसों की खेती बंद करनी पड़ी, क्योंकि नील गाय इन फसलों को काफी नुकसान पहुंचाती हैं। इसी तरह कई अन्य मैदानी क्षेत्रों में आलू की खेती लोगों को भारी पड़ रही है। खेती के असली दुश्मनों में सूअर, साही, हिरन, नील गाय हैं। दूसरी तरफ बंदर पहाड़ी खेतों के बड़े दुश्मन बन चुके हैं। उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश के किसान बंदरों और सूअरों से परेशान रहते हैं। उत्तराखंड में तो कई गांवों ने खेती ही छोड़ दी, क्योंकि किसान कड़ी मेहनत करके खेतों में फसल उगाते हैं और बंदर, सूअर, साही और हिरण जैसे वन्य जीव उन्हें खा जाते हैं।
पिछले दो दशकों में इस समस्या पर कोई गंभीर पहल नहीं हुई, इसलिए हालात बदतर होते गए। चाहे पहाड़ी क्षेत्र हो या मैदानी इलाका, पिछले कुछ समय से बाघों का आक्रामक रूप देखने को मिल रहा है। लगभग हर दिन बाघ के हमले की कोई न कोई घटना सामने आ रही है। आजकल उत्तराखंड में, चाहे वह शहर हो या गांव, बाघ के आक्रमण लगातार बढ़ रहे हैं। बाघों का यह रुख उनके लिए तो आत्मघाती है ही, संपूर्ण पर्यावरण के लिए भी खतरनाक है। उत्तराखंड में तो बाघ के आतंक से बचने के लिए सरकार के खिलाफ चक्का जाम व कामकाज रोको प्रस्ताव सामने आ रहे हैं।
असल में जंगलों के अंधाधुंध विनाश के चलते जहां वन्य जीवों के आवासीय क्षेत्रों में कमी आई है, वहीं उन्हें भोजन की समस्या से भी दो चार होना पड़ता है। यही वजह है कि वन्य जीव भोजन की तलाश में रिहायशी इलाकों का रुख कर रहे हैं। इसके अलावा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए टाइगर सफारी जैसे कार्यक्रमों से भी वन्य जीवों के जीवन का संकट बढ़ा। जगह-जगह टाइगर सफारी परियोजनाओं को मंजूरी देते वक्त यह नहीं देखा जाता कि उस क्षेत्र के वन्य पशुओं के जीवन में मनुष्यों की ऐसी दखलंदाजी का क्या असर पड़ेगा।
सवाल उठता है कि क्या हमने बाघों के भोजन की भी कोई व्यवस्था की है। बाघ घास तो खाएंगे नहीं, वे या तो अन्य जीवों का शिकार करेंगे या भोजन की तलाश में रिहायशी इलाकों का रुख करेंगे। वन्य जीवों का जीवन एक खाद्य शृंखला में चलता है। घास खाने वाले जीवों से लेकर मांसाहारी जीव तक, सभी एक पारस्थितिकी का हिस्सा हैं। जंगल की घास पर खरगोश, हिरन या फिर अन्य शाकाहारी जीव निर्भर रहते हैं और इन शाकाहारी जीवों पर मांसाहारी जीवों का जीवन निर्भर करता है। वनों के ह्रास व जंगलों में आग लगने से शाकाहारी जीवों की संख्या में बड़ी कमी आई है। यही करण है कि बाघ जैसे हिंसक जानवर अपने भोजन की तलाश में रिहायशी इलाकों में आते हैं और मवेशियों व मनुष्य का शिकार करते हैं। इसी तरह हाथी, नील गाय, सूअर, हिरण जैसे शाकाहारी जीव खेतों का रुख करते हैं। इसलिए बाघों को बचाने के साथ-साथ उसके भोजन की चिंता भी करनी चाहिए। लेकिन हमने विकास की दौड़ में मनुष्य और उसकी सुविधाओं को ही केंद्र में रखा।
बाघ संरक्षण की तरह ही अन्य वन्य पशुओं के संरक्षण के लिए भी ठोस कार्यक्रम शुरू करने चाहिए। तभी हमारी जैव विविधता बरकरार रहेगी और पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहेगा। संरक्षण अभियान का दायरा केवल बाघों की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें उन परिस्थितियों को लाना चाहिए, जिनसे बाघ और आदमी के बीच संतुलित रिश्ता बन सकता है। लेकिन सरकारी रिपोर्टों से यह परिलक्षित नहीं होता कि अन्य वन्य जीवों के संरक्षण या पूरी पारिस्थितिकी तंत्र में बढ़ते असंतुलन को कम करने के लिए सरकार क्या कर रही है।
हमने अभयारण्य व पार्क जरूर बनाए, पर उनके हालातों की कभी समीक्षा नहीं की। जंगली जानवरों के प्रकोप से बचना है, तो इनके भोजन की भी चिंता करनी होगी। अगर समय रहते इस पर नहीं सोचा गया, तो आगे मनुष्यों एवं जानवरों के बीच मुठभेड़ और बढ़ेगी। यह बिगड़ती पारिस्थितिकी तंत्र का ही परिणाम है कि आदमी बनाम जानवर आज एक बड़ा मुद्दा बन चुका है।