जब प्रियंका गांधी ने इस बात का खंडन कर दिया है कि उन्होंने चुनाव लड़ने की इच्छा ही व्यक्त नहीं की, तब उनके राजनीति में सक्रिय होने को लेकर उठे विवाद को यही समाप्त हो जाना चाहिए। वैसे भी इस खबर पर विश्वास करने का कारण नहीं था कि प्रियंका ने वाराणसी से चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की, लेकिन कांग्रेस ने उसे खारिज कर दिया। क्या कोई यह विश्वास कर सकता है कि प्रियंका कुछ चाहें और पार्टी उसे खारिज कर दे? हालांकि बहुत लोग मानते हैं कि प्रियंका को चुनावी राजनीति में आने से रोकने वाले लोग हैं, जबकि वह इसके लिए तैयार हैं, लेकिन किसी दृष्टि से इसकी पुष्टि नहीं होती।
वस्तुतः प्रियंका के चुनावी राजनीति में उतरने की खबरें जब-तब आती रहती हैं और इसका खंडन भी उनकी तरफ से आ जाता है। पिछली बार 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान उनके पति रॉबर्ट वाड्रा ने पत्रकारों से बातचीत में कह दिया था कि अभी राहुल की बारी है, जब प्रियंका की बारी आएगी, तो वह भी लड़ेंगी और इसके लिए वह तैयार हैं। प्रियंका ने तुरंत इसका खंडन किया। उन्होंने बार-बार कहा है कि अभी वह अपनी मां एवं भाई के क्षेत्र यानी रायबरेली एवं अमेठी तक अपनी राजनीतिक गतिविधियां सीमित रखना चाहतीं हैं। अभी तक उनकी सीमाएं यहीं तक रही भी हैं।
हालांकि पिछले कुछ महीनों से उनकी भूमिका कांग्रेस में बढ़ती दिख रही है। वह पार्टी पदाधिकारियों की बैठक के पूर्व कुछ प्रमुख नेताओं से मिलती हैं और एजेंडे पर चर्चा करती हैं। पार्टी की कार्यसमिति एवं महाधिवेशन के पूर्व भी ऐसा करती हैं। इतना ही नहीं, घोषणा पत्र जारी होने के पूर्व रात्रि में वह नेताओं से मिलीं, साथ ही राहुल गांधी के वाररूम पर भी पूरा ध्यान रखती हैं।
कांग्रेस में और बाहर भी, बहुतेरे लोगों की यह धारणा है कि प्रियंका में जनता को आकर्षित करने तथा विरोधियों का प्रत्युत्तर देने की क्षमता है। उनके चेहरे पर आकर्षण है। वह मुस्कराते हुए अपनी बात रखती हैं, जिनसे संदेश अच्छा निकलता है। कई बार वह आलोचनाओं का उत्तर भी सहजता से देती हैं।
हालांकि उनकी जन लोकप्रियता और राजनीतिक क्षमता का अभी परीक्षण होना शेष है। 1999 में उन्होंने सुल्तानपुर में अवश्य अरूण नेहरू के खिलाफ एक छोटा भाषण दिया था। इसमें उन्होंने कहा था कि जिस आदमी ने उनके पिता को धोखा दिया, उसे आपने कैसे समर्थन दे दिया। माना जाता है कि इसका असर हुआ और अरूण नेहरू ने भी कहा था कि प्रियंका के विरोध के कारण वह चुनाव हार गए थे। यह उस समय की बात है, जब सोनिया गांधी पहली बार चुनाव मैदान में उतरी थीं।
अभी उन्होंने अपने चचेरे भाई वरुण गांधी के विरुद्ध एक बयान दिया है। इसमें कहा है कि वह रास्ता भटक गए हैं, इसलिए जनता को उन्हें रास्ते पर लाना चाहिए। यानी जनता उन्हें चुनाव में पराजित करें। वरुण भाजपा के टिकट पर सुल्तानपुर से चुनाव लड़ रहे हैं, जो अमेठी का पड़ोसी है। तो 1999 के बाद पहली बार प्रियंका गांधी ने किसी को हराने की अपील जनता से की है। इसका कितना असर होगा यह देखना चाहिए।
जो भी हो, यह मानना ठीक नहीं होगा कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर परिवार के अंदर कोई मतभेद होगा। हम वंशवादी नेतृत्व की आलोचना करें, उस परिवार की भी आलोचना करें, कांग्रेस की, उसकी नीतियों की, नेता के नाते सोनिया गांधी, राहुल गांधी की भी आलोचना स्वाभाविक है, पर यह मानने का कोई कारण नहीं दिखता कि प्रियंका राजनीति में आना चाहती हैं, मगर उन्हें आने नहीं दिया जा रहा है। यह संभव है कि आम चुनाव के परिणाम यदि अनुकूल नहीं आए, तो फिर प्रियंका को लाने की मांग उठे।