हमारे यहां दो प्रकार के दामाद पाए जाते हैं, निजी दामाद और सरकारी दामाद। इसके अलावा कुछ दामाद घर जमाई भी होते हैं। दामाद को घर में सम्मानपूर्वक ‘जमाई राजा’ कहकर भी पुकारा जाता है। इस कारण जमाई अक्सर खुद को ‘राजा’ समझने लगता है। सरकारी दामाद भी जमाई राजा टाइप ही होते हैं।
लेकिन आधुनिक भारत का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि दामाद ससुरालियों के साथ-साथ सरकार का भी बंटाधार कर डालते हैं। सरकार की मजबूरी होती है कि उसे दामाद की खिदमत में जुटना पड़ता है। कई बार खिदमत इतनी बेहिसाब हो जाती है कि दामाद छोटी-मोटी गलती कर बैठता है, जिसे मीडिया वाले बड़ा बना डालते हैं।
लेकिन दामाद चूंकि सरकार का दामाद होता है, लिहाजा वह बेफिक्र रहता है और करप्शन आदि के आरोप लगने के बाद भी सफाई देने नहीं आता। सरकार खुद सारा काम-धाम छोड़ उसके बचाव में कूद पड़ती है। ऐसे मौकों पर मंत्रियों-संतरियों में चाटुकारिता के चरम के दर्शन होते हैं।
सरकारी दामाद की खातिर वे जान देने तक की हुंकार भरते हैं, हालांकि इसकी नौबत कभी आती नहीं। लेकिन इस तरह की डींगें हांककर बयान बहादुर मंत्री पार्टी हाई कमान में अपने नंबर बढ़ा लेते हैं। इस तरह परोक्ष रूप से दामाद कई नेताओं की तरक्की की राह खोलता है।
सरकारी दामादों के अलिखित अधिकार तो होते हैं, लेकिन उनके कर्तव्यों का कोई उल्लेख नहीं मिलता। चूंकि दामादों के कर्तव्यों पर संविधान खामोश है, इसलिए सरकारी दामादों के पास काम-धंधा नहीं होता। जब ‘काम’ नहीं होता, तो दामाद ‘धंधा’ शुरू कर देते हैं।
नादान लोग लांछन लगाने लगते हैं कि दामाद धंधे में उतर गया। जबकि नादान ये नहीं जानते कि धंधा करना दामाद की जरूरत नहीं, बल्कि बोरियत दूर करने के उपाय होते हैं। दामाद का बोर होना सरकारों के लिए शुभ संकेत नहीं होता। इसीलिए दामाद सत्ता द्वारा प्रदत्त अदृश्य शक्तियों का भरपूर उपयोग कर रहा होता है।
दामाद की राजनीतिक जमीन बहुत मजबूत होती है, इसलिए जमीन की खरीद-फरोख्त का धंधा उसे ज्यादा सूट करता है। वह जमीनों की डील पर डील करता जाता है और एक दिन रियल एस्टेट का बड़ा डीलर बन जाता है। अपने इस नए अवतार में दामाद इस कदर घुल-मिल जाता है कि कभी-कभी तो यही पता नहीं चलता कि डीलर कौन है और दामाद कौन!