कोई भी दल सत्ता में इसीलिए आना चाहता है न...कि विपक्ष में रहते हुए उसके कार्यकर्ता कुछ करने लायक नहीं रह जाते। पांच साल की गारंटी हो, तो फिर भी कोई बात नहीं, मगर हमारे यहां तो वर्षों बाद सत्ता पलटी है। इस पर भी हाई कमान कह रहा है कि ट्रैफिक नियम का पालन करो, पुलिस थाने मत जाओ, विधायक की चिट्ठी का उपयोग मत करो, न सिफारिश करो, न सिफारिश करवाओ, तो क्या करें...! वैसे ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें, जैसे अब तक बैठे हुए थे? यदि कुछ नहीं करने देना है, तो हमारी सरकार होने का क्या मतलब है?
समाज में, शहर में और प्रदेश में साख इसी से बनती है कि आप कितने गलत काम, सही-सही दस्तखत से करवा लेते हैं। यदि सारी हिदायतें मान लीं, तो दंड-कमंडल लेकर जंगल में निकल जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। यदि मोहल्ले का कोई व्यक्ति थाने में बंद है, तो अच्छा लगता है कि मंत्री के कद का कोई नेता थाने पर आए और उसे छुड़वाए।
अब मुख्यमंत्री के ही भाई-भतीजे का मामला लें! कितनी भद्द पिटी कि उन्हें खुद थाने जाना पड़ा! यह काम तो उस इलाके का कोई भी नेता करवा सकता था। लेकिन सीएम खुद ही पहुंच गए और चारों ओर खबर फैल गई।
ऐसे-कैसे काम कर सकेंगे हम लोग...? हाथ-पैर बांध दिए हैं हमारे तो? कार्यकर्ता ने नेता से पूछा।
कुछ नहीं! आप लोग सत्ता में नए आए हो, इसलिए आपको पता नहीं कि आप क्या-क्या कर सकते हैं। इसे यों भी ले सकते हैं कि हाई कमान ने रोकने के बहाने यह बताने का प्रयास किया है कि आप ये... ये...काम भी कर सकते हैं। जब मुख्यमंत्री को खुद हर जगह पहुंचना पड़ रहा है, तो समझने वाली बात है कि कार्यकर्ताओं ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं समझी है। जब पार्टी सीख देती है, तो मतलब यही होता है कि ये सारे काम आप कर सकते हैं।
जाओ...अपना काम करो, घाघ नेता ने बताया, तो कार्यकर्ता एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। ‘हुर्रेऽऽऽ’ भी नहीं निकला उनके मुंह से!