अब तक माना जाता था कि समाज के कमजोर तबकों की सुरक्षा के लिए विशेष कानूनी और प्रशासनिक प्रबंध जरूरी हैं। गरीब, दलित, महिलाएं, आदिवासी और दिव्यांग इस दायरे में आते थे। पर अब इस दृष्टिकोण में परिवर्तन आ रहा है और कमजोर तबकों को दी जा रही सुरक्षा समाप्त करने की प्रक्रिया जोर पकड़ रही है। यह नई सोच नव उदारवादी दौर का हिस्सा है। इस दौर में गरीबों और कमजोरों को अपनी गरीबी और कमजोरी के लिए खुद जिम्मेदार समझा जाता है। कल्याणकारी नीतियों और सुरक्षा प्रदान करने वाले कानून को समाप्त करने के लिए विचारों में परिवर्तन भी करना पड़ता है। प्रसार-प्रचार के माध्यमों का ध्यान आजकल महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों को निष्प्रभावी बनाने पर है।
एक कानून है, फौजदारी की धारा 498 ए। इससे उनको डरना चाहिए, जो अपनी पत्नियों या बहुओं को परेशान करते हैं। पर मीडिया की मानें, तो इस धारा से पूरा भारत डरा हुआ है, क्योंकि इसका ‘दुरुपयोग’ होता है। इससे ऐसा लगता है कि खुशहाल महिलाओं के पास अपने निर्दोष पतियों और ससुराल वालों को फंसाने के अलावा कोई काम नहीं बचा है। अदालत ने भी देश की लाखों महिलाओं को ‘झूठी’ करार देकर 498 ए को केवल निष्प्रभावी ही नहीं, बल्कि शिकायत करने वाली महिलाओं के खिलाफ इस्तेमाल करने वाली एक धारा में परिवर्तित करने का काम हाल ही में किया है। उन्होंने इस धारा के अंतर्गत होने वाली शिकायतों को तब तक दर्ज करने से प्रशासनिक अधिकारियों को रोका है, जब तक कि जिला स्तर पर उन समितियों द्वारा अनुमति प्राप्त नहीं हो जाती, जिनका गठन ऐसे मामलों की जांच के लिए जिला प्रशासन द्वारा किया जाना है। ऐसी कमेटियों का हमारा अनुभव बहुत कड़वा है। जेल में अनियमितताओं की जांच करने वाली कमेटियां अपराधियों की ही मदद करती दिखाई देती हैं; पति-पत्नी के झगड़े सुलझाने वाली कमेटियों ने पत्नियों को ससुराल वापस जाने के लिए ही जोर दिया है; राशन प्रणाली की निगरानी करने वाली कमेटियों ने राशन की कालाबाजारी कम करने का काम नहीं किया है। ऐसे में, कमेटियां उन औरतों को न्याय देंगी, जो हिंसा और उत्पीड़न की शिकार हैं?
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि 498 ए के तहत दर्ज मामलों में बहुत बढ़ोतरी हो रही है। इससे अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि महिलाएं जल्दबाजी में मुकदमा दर्ज कर देती हैं। जबकि शादीशुदा महिलाएं कितनी ही बार मारपीट की घटनाओं को परिवार की इज्जत के नाम पर ‘माफ’ कर देती है। पुलिस का कहना है कि दर्ज मामलों में केवल आठ फीसदी ही फर्जी निकलते हैं। इन आठ फीसदी की सजा तमाम महिला समुदाय को दी जा रही है। हरियाणा में सिरसा जिले के मंजुखेर गांव में चार साल की एक बच्ची का बदन उसकी दादी ने गर्म चिमटे से दाग दिया, क्योंकि यह उनकी तीसरी पोती थी। दादी को जेल भेज दिया गया, क्योंकि उनकी बहू ने पुलिस को सही बात बता दी। उसके पति और ससुर का कहना था कि दादी ने गलती से गर्म चाय गिरा दी थी। अब बहू भी यही बात दोहरा रही है, पर चूंकि बच्ची की डॉक्टरी जांच हो चुकी है, इसलिए प्रशासन मुकदमा वापस नहीं कर रहा। न जाने, कितनी महिलाओं के लिए हिंसा जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। उन्होंने तो थाने जाकर रिपोर्ट लिखवाने के रास्ते पर पहला कदम भी नहीं रखा। अगर न्यायपालिका ही उनका यह रास्ता हमेशा के लिए बंद कर दे, तो यह कितनी बड़ी त्रासदी होगी।
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं