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काबिलियत और निष्ठा को तरजीह

Sun, 09 Nov 2014 08:37 PM IST
मनीषा प्रियम
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केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार से यह स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने गवर्नेंस और सुधार के मुद्दे पर पुरजोर कार्रवाई करने के लिए अब खुद को तैयार कर लिया है। मई में सरकार बनने के बाद जब मंत्रिमंडल का गठन किया गया था, तब सरकार के छोटे आकार के होने तथा कम लोगों को ही जगह देने की बात कही गई थी। कहा यह भी गया था कि स्थानीय प्रतिनिधित्व और वंशवाद को दरकिनार किया जाएगा। इसी कड़ी में एक ही व्यक्ति को कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी दी गई। नितिन गडकरी को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग तथा जहाजरानी मंत्रालय का पदभार दिया गया, तो अरुण जेटली को वित्त मंत्री के साथ ही रक्षा मंत्री भी बनाया गया। किन अन्य लोगों को सरकार में जगह दी जाएगी और मंत्रिमंडल विस्तार की नीति क्या होगी, तब इसका स्पष्ट खुलासा भी नहीं किया गया था। लेकिन एक बात साफ थी कि नरेंद्र मोदी सरकार पूर्ववर्ती यूपीए सरकार से बिल्कुल अलग है। इसकी बड़ी वजह तो यही थी कि मनमोहन सिंह 'दंतविहीन प्रधानमंत्री' होने के कारण आलोचकों के निशाने पर थे। यूपीए सरकार में 'मंत्रियों के समूह' (ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स) के माध्यम से महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते थे। इसलिए जहां प्रधानमंत्री को सामूहिक जिम्मेदारी लेते हुए तथा मंत्रिमंडल के अगुआ नेता के रूप में दिखना चाहिए था, वहां मनमोहन सिंह 'मंत्रियों के समूह' की गुटबाजी के शिकार हो गए। मनमोहन सिंह के बरक्स नरेंद्र मोदी ने दिखाया कि प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल का अगुआ नेता होता है। उन्होंने सरकार का आकार छोटा रखने और काबिल लोगों को ही इसमें शामिल करने की बात कही।
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मगर जल्दी ही यह स्पष्ट हो गया कि वित्त और सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय एक ही व्यक्ति नहीं संभाल सकता, और न ही पर्यावरण तथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय को एक किया जा सकता है। नतीजतन मंत्रिमंडल विस्तार जरूरी था। लेकिन मंत्रिमंडल के इस विस्तार में न सिर्फ जातिगत समीकरण का ध्यान रखा गया, बल्कि नवनियुक्त मंत्रियों की योग्यता तथा मोदी के प्रति उनकी निष्ठा को भी एक पैमाना बनाया गया। रविवार को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में अधिकांशतः उन लोगों को ही शपथ दिलाई गई, जो प्रधानमंत्री के प्रति प्रतिबद्ध हैं। यानी इस विस्तार से नरेंद्र मोदी का वर्चस्व पूरी तरह स्थापित होता दिख रहा है।

नए मंत्रिमंडल में जो कुछ उल्लेखनीय नाम हैं, उनमें निर्विवाद रूप से मनोहर परिकर सर्वोपरि हैं। उन्हें राजनीतिक दक्षता और अपने अनुभव का लाभ मिला है। मगर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि वह मोदी के घोर समर्थक हैं और उनके लिए आडवाणी तक से उलझ चुके हैं। दूसरे महत्वपूर्ण चिंतक सुरेश प्रभु हैं, जिनकी पकड़ महाराष्ट्र के ऊर्जा क्षेत्र पर है। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान पर्यावरण मंत्रालय भी संभाला है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत और चीन के बीच सीमा के साथ-साथ आर्थिक और पर्यावरण संबंधी प्रतिस्पर्धा भी है, इसलिए यह सोचकर कि यहां प्रभु का योगदान महत्वपूर्ण हो सकता है, उन्हें कैबिनेट में जगह दी गई है। भाजपा और शिवसेना की नोकझोंक को दरकिनार करते हुए एक स्पष्ट निर्णय के तहत मोदी ने उन्हें कैबिनेट मंत्री की शपथ दिलाई है।
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नए चेहरे में हंसराज गंगाराम अहीर भी प्रमुख हैं। अहीर एक दिग्गज सांसद हैं और चार बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं। एक सांसद के तौर पर उन्होंने ही कोयला और स्टील पर बनी संसदीय कमिटी में कोयला खदानों के आवंटन में हुई गड़बड़ियों की बात उठाई और फिर वह सेंट्रल विजिलेंस कमिशन (सीवीसी) के सामने पहुंचे। कोयला खदानों के आवंटन में हुए घोटाले को उजागर करने वाले अहीर कोयला को महज एक उद्योग के रूप में नहीं देखते, बल्कि खदानों की वहज से विस्थापित होने वाले लोगों के प्रति भी एक लोकोन्मुख समझदारी रखते हैं। इसके अलावा जयंत सिन्हा का नाम भी उल्लेखनीय है, जो आईआईटी के हैं और हॉर्वर्ड से पढ़े हैं। वह उद्योग जगत में लंबे अरसे तक विश्व स्तर पर काम कर चुके हैं। अनुसूचित जनजाति के हरिभाई चौधरी और जाट वोटों को ध्यान में रखते हुए सांवरलाल जाट जैसे नेताओं को नए मंत्रिमंडल में जगह दी गई। इन कुछ चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल करना बताता है कि मोदी वैश्विक नजरिये के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने मंत्रिमंडल विस्तार के बहाने पहली बार संसद पहुंचे नए तथा साफ छवि वाले लोगों को भी अपने साथ जोड़ा और पारंपरिक राजनीति भी की।

इसके अलावा मंत्रिमंडल के विस्तार में मैदानी इलाकों में होने वाली आगामी चुनावी जंग का भी पूरा ध्यान रखा गया है। बिहार के तीन नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह देना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। राबड़ी देवी को हराकर लोकसभा पहुंचे राजीव प्रताप रूडी को अमित शाह के महत्वपूर्ण सहयोगी और महाराष्ट्र के चुनाव में मेहनत का पुरस्कार मिला, तो गिरिराज सिंह की 'मोदी निष्ठा' ने मंत्रिमंडल में जगह दिलाई। राजद का दामन छोड़कर लालू की पुत्री मीसा भारती को हराने वाले रामकृपाल यादव को भी मंत्रिमंडल में शामिल करना बताता है कि बिहार में चुनावी बिगुल अब बज चुका है।

हालांकि इस पूरे परिदृश्य में शिवसेना और भाजपा की नोकझोंक भी सुर्खियों में रही। उद्धव ठाकरे द्वारा अनिल देसाई को दिल्ली एयरपोर्ट से वापस बुलाना और शिवसेना का मंत्रिमंडल के विस्तार में शामिल न होना बताता है कि इन दोनों पार्टियों की राहें एक साथ शायद ही आगे बढ़ें। वैसे यह साफ नहीं है कि महाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा के साथ विधानसभा में बैठेगी या फिर उसका विरोध करेगी। हालांकि इस रस्साकशी के बाद भी राष्ट्र की निगाहें राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल पर टिकी रहीं, जहां मोदी सरकार ने स्थायी स्वरूप धारण किया है। यानी मुख्य समाचार शिवसेना नहीं, मोदी सरकार ही है।
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(गार्गी कॉलेज में प्राध्यापक एवं राजनीतिक विश्लेषक)
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