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पंचर साइकिल और गुजराती डांडिया

Sun, 09 Nov 2014 07:49 PM IST
अमिताभ श्रीवास्तव
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पेड़ से उतरते ही विक्रम के कान में बेताल सीबीआई-सा फुसफुसाया, अपना अघोरी बता रहा था कि चंद महारथी समय का चक्र बदलने के लिए निकल पड़े हैं। कौन हैं ये लोग? विक्रम मुस्कराया और बोला, कोई पच्चीस साल पहले की बात है। कुछ फुर्सती सिपाहियों ने एक पार्टी बनाई थी, जनता दल। चुनाव चिह्न के नाम पर एक चक्का जुगाड़ लिया था। सोचा, पहिया है, तो गाड़ी भी तैयार हो ही जाएगी। पर सिंहासन एक था, पाये चार और दावेदार हजार। दो बरस भी नहीं बीते कि सब अलग हो गए। किसी ने साइकिल की दुकान खड़ी कर ली, कोई रामलीला के लिए तीर बेचने लगा। कोई अंधेरे राज्य में लालटेन बेचकर किस्मत चमकाने लगा और एक पहलवानों के प्रदेश में रंगीन सपने दिखाने वाले चश्मों की तिजारत करने लगा।
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फिर एक दिन कहीं दूर से गुजराती डांडिया लिए एक दढ़ियल योद्धा आया। उसने साइकिल पंचर कर दी, चश्मा फोड़ दिया, लालटेन बुझा दी और तीर भी तोड़ दिया। अब ये तमाम चोटिल योद्धा राजनीतिक बियाबान में भटक रहे थे। वहीं दूर दक्षिण से आया एक और भटका साथी इन्हें दिखा, जो साल भर के प्रधानमंत्री पद का सर्टिफिकेट सीने से चिपकाए ऊंघ रहा था। सब एक दूसरे को देख खौरियाए, फिर मुस्कराए। सबने कहा, पुराना दर्द भूल जाएं, और आगे की सोचें।

तो करें क्या, ताजा-ताजा पटके गए पहलवान ने पूछा। अपनी-अपनी तीली निकालो-फिर से चक्का बनाएंगे। पर चक्का चलेगा कैसे? डांडिये वाले की पार्टी के पास रथों की भरमार है और हमारे चक्के के लिए रास्ता बेहद उबड़-खाबड़, ऊंघते पूर्व प्रधानमंत्री ने पूछा।
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धर्मनिरपेक्षता की ग्रीस हमने बचाकर रखी है। चक्का दौड़ेगा। हमारा चक्का लड़खड़ाया, तो तमाम इसे सहारा देने के लिए दौड़ पड़ेंगे-साइकिल वाले पुराने खांटी सिपाही ने कुर्ते की जेब से ग्रीस का डिब्बा निकाल कर कहा। सब आंखें बंदकर मुस्कराने लगे। सिंहासन का सपना फिर दिल में गुल्ली-डंडा खेलने लगा। कहानी सुन बेताल मुस्कराया और फुर्र हो लिया।
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