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प्रचंड कहां ले जाएंगे नेपाल को

Wed, 17 Aug 2016 06:59 PM IST
एस डी मुनि
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एस डी मुनि
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माओवादी नेता पुष्प कमल दहल दूसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने हैं। ढाई सौ साल पुरानी राजशाही से वर्ष 2006 में एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन के बाद पिछले एक दशक में यह नेपाल में नौवां सत्ता परिवर्तन है। लगातार सत्ता परिवर्तन वहां की खंडित राजनीति का परिणाम है, जिसमें सत्ता हासिल करना और उसे किसी भी तरह से बनाए रखना विकास, स्थिरता और लोगों की सुशासन की आकांक्षा पर हावी हो गया है। पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली के करीबी सहयोगी रहे प्रचंड ने उनका साथ इसलिए छोड़ा, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि ओली उनकी माओवादी राजनीति पर अतिक्रमण कर लेंगे और कथित मानवीयता के खिलाफ अपराध तथा मानवाधिकार से संबंधित विद्रोह भड़काकर उनके व्यक्तिगत नेतृत्व को खत्म कर देंगे।
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अपने नौ महीनों के शासन के दौरान खुद को सबसे मजबूत राष्ट्रवादी नेता के रूप में उभारने के लिए ओली ने वास्तव में नेपाल के ज्यादातर ताकतवर राजनीतिक गुटों को अलग-थलग कर दिया। उन्होंने संघवाद और समान अधिकार के मुद्दे पर मधेस और अन्य वंचित समुदायों को उनकी सांविधानिक आकांक्षा को ठुकराकर अलग-थलग कर दिया। उन्होंने संविधान सभा/ संसद में सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी नेपाली कांग्रेस और अपनी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) की पूर्व सहयोगी को सांविधानिक और मधेस मुद्दों पर मतभेद के चलते विपक्ष में धकेल दिया। वह अपनी पार्टी के वरिष्ठ सहयोगियों से असहज महसूस कर रहे थे और पार्टी तथा सरकारी मामलों को छोटी मंडली के सहारे चलाना चाहते थे। वह नेपाल के भूकंप पीड़ितों को पर्याप्त राहत एवं पुनर्वास मुहैया कराने में विफल रहे और एक ऐसे शासन के प्रमुख बने रहे, जो काला बाजारियों के प्रति नरम रहा और प्रभावी शासन देने में नाकाम साबित हुआ। और अंत में ओली ने अपने राष्ट्रवाद को साबित करने के लिए भारत विरोधी रुख अपनाकर भारत को नाराज किया और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के सवाल पर अविवेकपूर्ण कूटनीति अपनाते हुए चीन कार्ड खेला, जबकि भारत उसके साथ समझौता करना चाहता था।

नेपाल के नए प्रधानमंत्री प्रचंड इस बात को लेकर पूरी तरह से सचेत हैं कि यह उनके नेतृत्व और शासन क्षमता को साबित करने का आखिरी मौका है। उनके पास अवसर है कि वह घरेलू मुद्दों तथा अपने दो महत्वपूर्ण शक्तिशाली पड़ोसियों-भारत और चीन के साथ संबंधों के मामले में ओली ने जो चिंतनीय विरासत सौंपी है, उसे सुधार सकें। और ऐसा करने के लिए उनके पास बहुत समय नहीं है।
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प्रचंड ने मधेस और जनजाति समूह की शिकायतों को दूर करने के लिए प्रक्रियाओं की शुरुआत कर दी है। उनके आंदोलनों के दौरान ओली सरकार के कठोर रवैये और दमनकारी उपायों से जो घाव हुए हैं, उन्हें सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई के जरिये ठीक करने में बहुत मुश्किल नहीं होनी चाहिए। हालांकि सांविधानिक सुविधा के लिए दो तिहाई बहुमत जुटाने में विकट कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि ओली के नेतृत्व वाली यूएमएल का सहयोग उन्हें न मिले। प्रचंड को यह सुनिश्चित करने के लिए भी सावधान रहना होगा कि राहत का राजनीतिक दुरुपयोग न हो और वह जरूरतमंदों तक सीधे पहुंचे। उनका पिछला रिकॉर्ड और उनकी छवि भ्रष्टाचार और राजनीतिक जोड़-तोड़ के मामले में बेदाग नहीं है।

विदेश नीति के मामले में प्रचंड ने अपने दोनों बड़े पड़ोसियों के बीच स्वाभाविक संतुलन बहाली का वायदा किया है। उन्होंने अपनी इस मान्यता के पर्याप्त संकेत दिए हैं कि नेपाल की राजनीतिक एवं विकासात्मक गतिशीलता में भारत का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया कि भारत को लेकर पहले उनका नजरिया त्रुटिपूर्ण था और अब वह अपने दक्षिणी पड़ोसी के साथ परस्पर लाभदायक रिश्तों के लिए काम के अनुभव से परिपक्व हो गए हैं। प्रचंड निश्चित रूप से जानते हैं कि नई दिल्ली को उनके वायदे पर चिंता और संदेह है। इसलिए उनके लिए सबसे अच्छा तरीका ठोस एवं रचनात्मक कार्यों के जरिये भरोसा और परस्पर विश्वास तैयार करना होगा।

भारत के साथ भरोसे का रिश्ता बनाते हुए कोई भी नेपाली नेता चीन के साथ संबंधों की अनदेखी नहीं कर सकता। खासकर इसलिए भी कि चीन बेहद आक्रामक तरीके से दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अपनी सामरिक जगह का विस्तार करता प्रतीत होता है, जिसमें नेपाल एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत को भी अपने पड़ोसियों से अनुचित और अव्यावहारिक उम्मीद करने के बजाय नेपाल और दक्षिण एशिया में चीन की चुनौतियों का सामना करने के लिए एक सतत दृष्टिकोण अपनाना होगा।

प्रचंड सरकार तभी सफल होगी, जब वह अपने आंतरिक सद्भाव और एकजुटता को सुरक्षित रख पाएगी। इस नई सरकार में नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी है। प्रधानमंत्री प्रचंड की कोई भी विफलता नेपाली कांग्रेस की भी विफलता होगी। सरकार में कई अन्य छोटे-छोटे सहयोगी हैं, जो राजनीतिक संरक्षण और सत्ता के बंटवारे के विचार से समान रूप से संचालित होते हैं। इस मसले पर उत्पन्न कलह से सरकार गठन बेहद कठिन और जटिल होता है। राष्ट्रीय मोर्चे पर विफलता से बचने के लिए मौजूदा गठबंधन साथियों के बीच की ऐसी महत्वाकांक्षा पर उदारता प्रचंड और नेपाली कांग्रेस नेतृत्व के लिए चुनौती है। याद किया जा सकता है कि सत्ता छोड़ते हुए ओली ने प्रचंड को चेताया था कि कुछ ही महीनों बाद वह विफल होंगे। इस भविष्यवाणी का गलत साबित होना न केवल नेपाल और नेपालियों के हित में होगा, बल्कि काठमांडु में नई राजनीतिक व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए भी। सौभाग्य से नेपाल के विकास और स्थिरता में रुचि रखने वालों की उम्मीद जिंदा रहे। नई दिल्ली के लिए बेहतर यही होगा कि नई नेपाली सरकार की राजनीतिक गतिशीलता से एक सम्मानजनक दूरी बनाए रखे और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस हिमालयी देश में भारत के दीर्घकालीन राष्ट्रीय हितों के संरक्षण एवं प्रोत्साहन के लिए काम करे।
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-जेएनयू के प्रोफेसर एमेरिटस, आईडीएसए के प्रतिष्ठित फेलो तथा पूर्व राजदूत
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