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खंभे की बिजली का मन डोला

Mon, 15 Sep 2014 07:06 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
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साधो, खंभे पर चढ़ी बिजली का मन डोलता रहता है। वह कभी आती है, तो अगले पल चली जाती है। मैंने उससे इस आवाजाही का कारण पूछा, तो वह बोली, मैं आने के लिए जाती हूं। जाऊं न, तो आने का कोई अर्थ नहीं। आप बिजली आने पर खुश होते हैं। आपकी इस खुशी को जिंदा रखने के लिए मेरा जाना जरूरी है। मैं चौबीस घंटे में दस बार रुखसत होती हूं, तो सिर्फ लौटकर आने के लिए ही। आपको तो मेरे जाने पर खुश होना चाहिए। मेरी वफादारी देखिए कि मैं थोड़ा घूम-फिरकर आपके पास दौड़ी चली आती हूं। कौन निगोड़ी है, जो एक बार जाकर लौटना पसंद करेगी? आप इस जमाने में हमसे इतनी वफा की उम्मीद करते हैं कि मैं जाऊं ही न। कभी-कभी बाजार-हाट के लिए मेरा निकलना जरूरी है।
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मैंने जरा-सा ड्योढ़ी के बाहर कदम बाहर रखा नहीं कि आप चिल्लाए। विभाग को गालियां दीं। सरकार को कोसा। थोड़ी देर में मैं आ गई, तो आप खुशी से झूम उठे। आप दौड़ पड़े अपने टीवी सेट, कूलर, फ्रिज और एसी की तरफ मेरी आमद का त्योहार मनाने। अब आप हैं कि अपने तन-मन को ठंडा कर रहे हैं और मैं खुद को जला रही हूं। मैं लगातार आपके घर में हाजिरी दे रही हूं हुक्म बजाने वाले जिन्न की मानिंद। मेरे आका, जिन्न अगर बोतल से बाहर निकलता है, तो उसके भीतर लौटता भी तो है।

आपने कभी जिन्न को देखा है? मैं भी उसी की तरह हूं। आप मुझे खंभे पर आते या दौड़ते देख नहीं सकते। बस, महसूस कर सकते हैं। मेरे जाने पर हंगामा मचाने का मतलब नहीं है। जितनी देर मैं नहीं होती हूं, आप भरी दोपहरियों और रातों में मुझे याद करते हुए जाग रहे होते हैं। इसका लाभ यह होता है कि उन अंधेरे लम्हों में चोर-उचक्के आपके घर घुस नहीं सकते। वैसे मेरे जाने पर उठाईगीर और लुटेरे मुझे बधाई देते हैं और दुआ करते हैं कि मैं देर तक न आऊं। पर इसका मतलब यह मत समझिए कि मैं इनसे मिली हुई हूं। मेरे लटके-झटके इतने तेज हैं कि हर कोई चोट खाए बैठा है। मेरे न होने पर सरकारों में बैठे लोगों के भी पसीने छूटने लगते हैं।
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