देश से गरीबी और धारावी का योग खत्म ही नहीं हो रहा। इसका जवाब यह है कि जब विदेशी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भारत दौरे पर आएंगे, तो उनकी पत्नी खाली वक्त में क्या मक्खियां मारेंगी? उनका टाइम पास करने के लिए ही तो देश में गरीबी को जिंदा रखा जा रहा है। संपन्न देश की प्रथम महिला यदि गरीबी देखने को तरस रही हो, तो क्या आश्चर्य! टीवी चैनल वाले भी तो झाबुआ और बस्तर के आदिवासियों को देखने के लिए बावले रहते हैं।
वैसे, जब भी बाहर से राष्ट्र प्रमुख भारत आते हैं, तो उनका मकसद ताजमहल के सामने बेंच पर बैठकर फोटो खिंचवाना भी होता है। जिस तरह गरीब बच्चों से हाथ मिलाकर यह बताया जाता है कि उनसे कितनी हमदर्दी है, उसी तरह ताजमहल के सामने बैठकर यह जताया जाता है कि पति-पत्नी में कितना प्यार बचा है, फिर भले अपने देश जाकर दोनों तलाक ही क्यों न ले लें।
ये बातें पहले समझ में नहीं आती थीं कि ‘गरीबी हटाओ’ के नारे से न जाने, कितने गरीब इस धरा से हट गए, मगर धारावी धरा ही है, हटने का नाम नहीं लेता। मुंबई को शंघाई और न जाने क्या-क्या बना देने की बात करने वालों के लिए धारावी को हटाना कोई मुश्किल काम तो था नहीं। गरीबों की झोपड़ी तोड़ने में लगता ही क्या है! अभी-अभी खबर आई है कि रूस की आबादी के बराबर भारत के गरीब, गरीबी रेखा से ऊपर निकल गए हैं। कितने ऊपर गए हैं, वापस नीचे आएंगे या नहीं, पता नहीं!
तो सरकार पर यह आरोप लगना अब बंद होना चाहिए कि वह गरीबी हटा नहीं पा रही। गरीब को हटा दिया, तो गरीबी कहां रह पाएगी! जो विदेशी बड़ी उम्मीद लगाए भारत दर्शन को आते हैं, यदि उन्हें गरीबी न मिली, तो वे कितने निराश होंगे। मुंबई से धारावी को हटा दें, तो भारत का पर्यटन उद्योग कंगाल हो जाएगा। फुरसत में अगर राहुल गांधी भी धारावी तक पदयात्रा कर आए हैं, तो उसके पीछे भी यही उद्देश्य है कि यह कमबख्त धारावी आखिर है क्या, देखें तो सही!