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उत्तर प्रदेश के अखाड़े में

Wed, 29 May 2013 09:37 PM IST
शंभूनाथ शुक्ल
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अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभार देकर भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। अमित शाह नरेंद्र मोदी के करीबी हैं, गुजराती हैं और एक अच्छे चुनाव मैनेजर हैं, इसलिए कॉरपोरेट जगत से पैसा उगाहने में माहिर भी। उनकी छवि मुस्लिम विरोधी राजनेता की है।
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वह सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में जमानत पर हैं। उनकी ये खूबियां और कमियां उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए प्लस होती हैं। दूसरी ओर, राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस की छवि दिनोंदिन कमजोर होती जा रही है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मिली कामयाबी उसकी अपनी जीत कम, भाजपा की हार अधिक है। ऐसे में तीसरे मोर्चे का ख्वाब पाले क्षेत्रीय दलों की चांदी है। अगर कोई राष्ट्रीय पार्टी 150 सीटों का आंकड़ा नहीं छू पाई, तो क्षेत्रीय नेताओं के दिन बहुरने के आसार दिख रहे हैं।
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अमित शाह के उत्तर प्रदेश में आ जाने से मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के पूरे आसार हैं। यह ध्रुवीकरण एक तरफ तो समाजवादी पार्टी के लिए मुफीद है, दूसरी तरफ प्रतिक्रिया में हिंदू वोटों को भी एकजुट होने को प्रेरित करता है। यानी हालात 1991 जैसे हैं। इसलिए सारा दारोमदार उत्तर प्रदेश पर ही टिकता है।

80 लोकसभा सीटों वाले इस प्रदेश में जो झंडे गाड़ेगा, वही देश पर राज करेगा। पिछली दो दफे से यानी 2004 और 2009 में यहां भाजपा का प्रदर्शन बहुत फीका रहा है और उसकी वजह रही है, उसका कट्टर हिंदुत्व से दूर चले जाना।

2009 में कल्याण सिंह को मुलायम सिंह अपने साथ ले गए थे, इसलिए उनसे मुस्लिम वोट छिटका था और उसने कांग्रेस को एकमुश्त वोट दे दिया था। नतीजा यह रहा कि कांग्रेस को राज्य में 21 सीटें मिल गई थीं और सपा को 22। इतनी ही सीट बसपा को मिली थीं, पर भाजपा सबसे पीछे रही, उसे कुल 10 सीटें मिलीं। इसीलिए इस बार भाजपा द्वारा कट्टर हिंदुत्व का कार्ड खेलने के आसार दिखने लगे हैं।

भाजपा पिछड़े नेताओं में से कल्याण सिंह को अपने साथ ले आई है। वह इस बार सेक्यूलरिज्म से एकदम दूर 1991 वाली भाजपा लग रही है, जब उसे प्रदेश में 50 सीटें मिली थीं। हालांकि तब उत्तराखंड की पांच सीटें भी उत्तर प्रदेश में शामिल थीं।

भाजपा के इस तरह कट्टर हिंदू कार्ड खेलने का फायदा मुलायम सिंह को मिल सकता है। यों भी मुलायम सिंह वोट खैंचू राजनीति में माहिर माने जाते हैं। मुस्लिमों को पता है कि भाजपा के कट्टर हिंदुत्व की काट मुलायम सिंह हैं, कांग्रेस नहीं। इसलिए वह अभी से सपा के झंडे तले इकट्ठा होने लगे हैं।

अभी पिछले महीने जिन मौलाना अहमद बुखारी ने इटावा में रैली करने की घोषणा की थी, अचानक अखिलेश यादव को प्रमाणपत्र देने लगे कि उत्तर प्रदेश में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है और खालिद मुजाहिद की संदिग्ध मौत की जांच के मामले में वह संतुष्ट हैं।

पिछले दिनों लखनऊ कचहरी बम कांड के आरोपी खालिद मुजाहिद की कोर्ट से लाते वक्त संदिग्ध हालत में मौत हो गई थी। खुद सपा सरकार ने इस मौत की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। यही नहीं, राज्य सरकार ने 17 मई को उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया, क्योंकि उस दिन अजमेर शरीफ में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का सालाना उर्स था।

मजे की बात कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अफगानिस्तान के चिश्त इलाके के रहने वाले थे और वहां उस दिन उर्स के रोज छुट्टी नहीं होती। उनके सबसे ज्यादा अनुयायी पाकिस्तान में हैं, लेकिन वहां भी छुट्टी नहीं है। उस राजस्थान में उर्स के रोज छुट्टी नहीं होती, जहां उनकी मजार है।

दरअसल मुलायम सिंह को लगता है कि अगर 2004 की तरह वह इस दफे भी राज्य में 30 से ऊपर सीटें ले आएं, तो उनकी सरकार बनने के आसार बन जाएंगे। उनका गणित यह है कि अगर वह सरकार न भी बना पाए, तो कोई भी सरकार उनकी हिस्सेदारी से ही बने।

इसलिए वह खुद को जितना मुस्लिमपरस्त बताएं, कभी भी भाजपा पर सीधे हमला नहीं करते। हाल में वरुण गांधी को जिस तरह से 2009 के भड़काऊ भाषण से दोषमुक्त किया गया, उससे यही लगता है कि उत्तर प्रदेश में मुलायम और राजनाथ के बीच एक नूरा कुश्ती चल रही है।
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