कभी गाना सुना था, दिल टोटे-टोटे हो गया। पर अब तो सीबीआई ही तोता है। ठीक भी है, मालिक की बात दोहराने वाला जीव तोता ही कहलाता है। जब कैद में चाहे बुलबुल हो या तोता, उसे अपने मालिक की हां में हां तो मिलाना ही है। पापी पेट के लिए आदमी क्या न करे।
दफ्तर में बॉस, स्कूल में टीचर और फिल्म में डायरेक्टर, जैसा चाहता है, वैसा हमें करना पड़ता है। ऐसे में भला सीबीआई की क्या बिसात। वह सरकार के खिलाफ जा नहीं सकती, क्योंकि नौकरी तो वह उसी की करती है। पूरे मुल्क में कहीं कोई हंगामा होता है, फौरन सभी सीबीआई से जांच कराने की मांग करने लगते हैं। उसे सभी अलादीन का चिराग समझते हैं कि रगड़ो और समस्या खत्म।
लेकिन केंद्र सरकार के सामने उसकी औकात सचमुच तोते से कम नहीं है। विपक्ष की किसी सरकार को परेशान करना है, तो तत्काल सीबीआई को उसकी कुंडली खंगालने को कहा जाता है। विपक्ष का कोई नेता अगर समर्थन के लिए आगे आता है, तो फौरन सीबीआई को कहा जाता है कि उसके खिलाफ जांच का काम बंद करो। तोते को मन मारकर यह सब करना ही पड़ता है। लेकिन पिछले दिनों कुछ ज्यादा ही हो गया।
अब कोयला घोटाले में सरकार के खिलाफ जांच हो रही है, और खुद सरकार के मंत्री बैठकर लिखवा रहे हैं कि रिपोर्ट में क्या लिखना है! यह तो हद है। ऐसे में शुक्र है भगवान का कि सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी पीड़ा समझी। उसने सरकार से कहा कि तोते रूपी इस सीबीआई को पिंजरे से आजाद करो। पहली बार सीबीआई को भी सरकार पर जबर्दस्त गुस्सा आया और उसने अश्विनी कुमार और पवन बंसल जैसों का बाजा बजा दिया। लो, अब भुगतो।
सुना है, सरकार अब सीबीआई को पिंजरे से आजाद करने के बारे में सोच रही है। पर ऐसा संभव है क्या! क्या तोते के बिना सरकार का काम चलेगा? और पिंजरे में रहते-रहते उड़ान भर चुका तोता यानी केंद्रीय जांच ब्यूरो क्या सचमुच आजाद हो पाएगा?
ऐसा हो या न हो, फिलहाल तो अदालत ने उसे जो पहचान दी है, उससे उसे छुटकारा मिलता नहीं दिख रहा। कल को हमारे कहने का चलन यह भी हो सकता है कि तोते ने अमुक मंत्री के खिलाफ जांच शुरू की। पर आजाद होने के बाद सीबीआई को यह नाम भी बदलना पड़ेगा। लेकिन पहले वह पिंजरे से आजाद तो हो। बाद की बाद में देखी जाएगी।