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प्रतीकों की राजनीति

पत्रलेखा चटर्जी
Updated Fri, 02 Nov 2018 06:27 PM IST
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स्टेच्यू ऑफ यूनिटी

सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का, जिसे स्टेच्यू ऑफ यूनिटी कहा जाता है, अनावरण गुजरात में 31 अक्तूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है।



इसे तैयार करने में न केवल भारतीय श्रमिकों ने, बल्कि 200 से ज्यादा चीनी श्रमिकों ने भी कठिन मेहनत की। इस विशाल मूर्ति के अनावरण के मद्देनजर मूर्तियों की राजनीति और अर्थशास्त्र के बारे में देश में एक भीषण बहस छिड़ गई है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, भारत के ‘लौह पुरुष’ की इस प्रतिमा की लागत करीब 3,000 करोड़ रुपये है।


गुजरात के नर्मदा जिले के केवड़िया गांव में इस विशाल मूर्ति का निर्माण स्थानीय आदिवासी आबादी को रास नहीं आया, जो महसूस करते हैं कि उन्हें इससे ज्यादा फायदा नहीं होगा। वे कहते हैं कि वे सरदार पटेल के खिलाफ नहीं है, लेकिन वे स्कूल, अस्पताल और रोजगार ज्यादा चाहते हैं। क्षेत्र के आदिवासी परिवारों ने यह भी आरोप लगाया है कि सरदार पटेल की मूर्ति के आसपास के इलाकों के विकास के लिए, जो सरदार सरोवर बांध से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित है, अनेक पेड़ काट डाले गए हैं। इससे जनजातीय क्षेत्रों में पर्यावरणीय क्षति हो रही है।

 

डाटा पोर्टल ‘इंडिया स्पेंड’ ने रेखांकित किया कि दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने में खर्च हुए रुपये का इस्तेमाल दो नए आईआईटी परिसर, दो एम्स परिसर, पांच नए स्थायी आईआईएम परिसर, पांच नए सौर ऊर्जा संयंत्रों के साथ-साथ कई मंगल मिशन और मून मिशन के लिए किया जा सकता था। दिलचस्प बात यह है कि अगर महाराष्ट्र सरकार की योजना के मुताबिक सब कुछ ठीक-ठाक चला, तो अगले कुछ साल में मुंबई के अरब सागर में बनाई जा रही छत्रपति शिवाजी की प्रतिमा दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा हो सकती है।

 

सरकारें 'विकास' को प्राथमिकता क्यों देंगी, जब वे विशाल मूर्तियों के निर्माण को लेकर इतनी उत्साही हों?


प्रतिमाएं और स्मारक 'विकास' नहीं हैं। वे बस प्रतीकात्मक हैं और उन लोगों की भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का आह्वान करते हैं, जो उन्हें देखने जाते हैं।

 

इस परियोजना से संबंधित पोर्टल पर उद्देश्यों के तहत कहा गया है कि स्टेच्यू ऑफ यूनिटी न केवल हर व्यक्ति को हमारे महान राष्ट्र के स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाएगी, बल्कि सरदार वल्लभभाई पटेल की एकता, देशभक्ति, समावेशी विकास और सुशासन की दूरदर्शी विचारधाराओं को विकसित करने के लिए देश के लोगों को प्रेरित भी करेगी।


भारत एकमात्र ऐसा देश नहीं है, जो मूर्तियों के उन्माद से पीड़ित है। अपनी पुस्तक मेमोरियल मैनिया में अमेरिकी लेखिका एरिका डॉस ने इसका जिक्र किया है कि अमेरिका में हर तरह के स्मारक क्यों बढ़ रहे हैं। डॉस के अनुसार, स्मारकों की बढ़ती संख्या अमेरिका में किसे और क्या याद किया जाना चाहिए, इस बारे में बढ़ी चिंताओं के सबूत हैं। वह कहती हैं, स्मारकों के लिए यह उन्माद 19वीं शताब्दी के मध्य से 20 वीं शताब्दी तक की मूर्तियों के जुनून से जुड़ा हुआ है। यह उन्माद आम से खास लोगों तक था, और गृहयुद्ध तथा पुनर्निर्माण के मद्देनजर अमेरिकी होने के मतलब के बारे में ताकतवर लोगों द्वारा आम सहमति बनाने का प्रयास था। संयोग नहीं है कि इनमें से अधिकांश मूर्तियां श्वेतों की हैं।

 

अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों ने भी महत्वपूर्ण हस्तियों का सम्मान करने के लिए मूर्तियां बनवाई हैं, लेकिन वे आमतौर पर स्व-वित्तपोषित पहल थीं, जबकि प्रभावशाली वर्ग (श्वतों) ने सार्वजनिक धन से इन मूर्तियों का निर्माण कराया।
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पूर्व कम्युनिस्ट देशों में भी मूर्तियां शक्तिशाली प्रतीक थीं। कम्युनिस्ट शासनों ने प्रचार के माध्यम से नियंत्रण बनाए रखा था, जिसे साम्यवाद की 'शक्ति और महिमा' का उत्सव मनाते हुए विशाल मूर्तियों और शिल्पों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया था। 1989 में बर्लिन की दीवार गिरने के बाद पूर्वी यूरोप के अधिकांश हिस्सों में लेनिन और अन्य लोगों की मूर्तियां तोड़ दी गई थीं।


हंगरी के बुडापेस्ट में प्रसिद्ध मोमेन्टो पार्क है, जहां द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के कम्युनिस्ट युग की 42 कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। पार्क के वास्तुविद लिखते हैं, 'ये प्रतिमाएं हंगरी के इतिहास का हिस्सा हैं। पिछले युग की तमाम यादों से छुटकारा पाने के लिए तानाशाहों ने इसके अतीत को मिटा दिया। लोकतंत्र ही एकमात्र शासन है, जो यह स्वीकार करने के लिए तैयार है कि हमारा अतीत आज भी हमारा है; हमें इसे जानना चाहिए, इसका विश्लेषण करना चाहिए और इसके बारे में सोचना चाहिए!'


भारत में प्रतिमाएं राजनीतिक कथाओं को आकार देने के लिए बनाई गई हैं, और यहां तक कि गरीब और अविकसित राज्यों में भी मूर्तियों को लेकर उन्माद है। याद कीजिए, अतीत में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने दलित महापुरुषों को श्रद्धांजलि देने के लिए आंबेडकर और कांशीराम के स्मारक बनवाए थे।


कोई तर्क दे सकता है कि भारत मूर्तियों की प्रतिस्पर्धी राजनीति का खर्च वहन नहीं कर सकता और इन स्मारकों के निर्माण में खर्च होने वाले संसाधनों का सार्वजनिक हित में कहीं और बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए लोगों को प्रतीकों की राजनीति के प्रति कम संवेदनशील होना पड़ेगा। जब तक वास्तविक कामकाज पर प्रतीकों की राजनीति हावी रहेगी, तब तक राजनीतिक स्मृतियों की पहचान एवं संरक्षण के तरीके के रूप में स्मारक और मूर्तियां बनती रहेंगी। महान नेताओं की याद में बनी मूर्तियां प्रेरणादायक हो सकती हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रतीक और मूर्तियां पेट भर सकती हैं। मूर्तियों के निर्माण के अलावा और क्या हो रहा है, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है।

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