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मिथक गढ़ने की राजनीति: US में कार्टर, भारत में डॉ मनमोहन सिंह... क्या स्मृति की आड़ में अस्तित्व बचाने की जुगत

एस प्रसन्नराजन Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Sat, 25 Jan 2025 05:03 AM IST

सार

जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जो सत्ता से बाहर हैं, उन्हें याद करना स्वाभाविक है, लेकिन इस आड़ में अगर वर्तमान की राजनीतिक साधुता खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए इतिहास की मनोनुकूल व्याख्या कर उनमें ऐतिहासिक नायक का मिथक गढ़ने लगे, तो ऐसे राजनीतिक प्रयासों का अर्थ समझा जा सकता है।
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जिमी कार्टर, जो बाइडन और डॉ. मनमोहन सिंह - फोटो : अमर उजाला/एजेंसी


पीछे मुड़कर देखने पर मूल्यांकन हमेशा उस समय के विचारों और दृष्टिकोणों से प्रभावित होता है, और यह संक्रमण के समय में सबसे अधिक स्पष्ट होता है। ऐसा नहीं है कि मृत्यु किसी व्यक्ति को उसके द्वारा जिए गए जीवन से बड़ा बना देती है। होता तो दरअसल यह है कि मृत्यु जीवित लोगों के दृष्टिकोण को बहुत ज्यादा भावुक बना देती है। यह शोक को एक राजनीतिक अनुष्ठान बना देती है। और तब और भी अधिक, जब दिवंगत व्यक्ति की जीवनी में ऐसे पर्याप्त अंश हों, जिनका शोक करने वालों द्वारा राजनीतिक उपयोग किया जा सके। यह जीवित लोगों की दृष्टि है, जो मृतकों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है-और इतिहास को एक मनोनुकूल पटकथा में बदल देती है।


एक उदाहरण लीजिए। अमेरिकी राष्ट्रपतियों की सूची में जिम्मी कार्टर एक कष्टनिवारक राष्ट्रपति से ज्यादा कुछ नहीं थे। अगर राजनीतिक विश्लेषण में चरित्र के अध्ययन को ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाए, तो पूर्व में मूंगफली की खेती करने वाले एक किसान का राष्ट्रपति बनना अमेरिकी राजनीति में सौम्य युग की वापसी जैसा था। लेकिन क्या यह भूला जा सकता है कि राष्ट्रपति कार्टर के कार्यकाल के दौरान अमेरिका आर्थिक रूप से व विदेश नीति के मामले में स्थिर रहा और ईरानी बंधक संकट से भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। उनके एक कार्यकाल ने रीगन द्वारा किए गए आक्रामक सुधारों को अपरिहार्य बना दिया। लेकिन अब उन्हें जिस तरह से नायक का दर्जा दिया जा रहा है, उससे तो यही लगता है कि सत्ता में रहते हुए उन्होंने जो खोया था, उसे मृत्यु के बाद वापस पा लिया। कार्टर इतने लंबे समय तक जीवित रहे कि ज्यादातर लोगों के लिए उनका राष्ट्रपतित्व एक धुंधली याद बन गया है। शोक संदेशों ने उनकी विरासत को ऐतिहासिक नॉस्टेल्जिया के रूप में मजबूत किया।


यह कोई सहज मरणोपरांत परिवर्तन नहीं था। यह राजनीतिक मजबूरी के कारण फिर से निर्मित की गई प्रतिष्ठा थी। ट्रंप युग में, जिसे राष्ट्रपति के किरदार की ढिठाई और आत्ममुग्धता द्वारा परिभाषित किया गया था, कार्टर की शांत सौम्यता आहत उदारवादियों के लिए मरहम बनती दिखी। अगर कार्टर का उदय राष्ट्रपति के पद छोड़ने के बाद शुरू हुआ, जिसमें नोबेल पुरस्कार भी शामिल था, तो 100 साल की उम्र में उनकी मृत्यु यह याद दिलाती है कि ट्रंप के बिना अमेरिका क्या हो सकता था। यह दरअसल, 47वें राष्ट्रपति की छाया है, जिसने 39वें राष्ट्रपति की छवि को नरम बना दिया है। इतिहास में कार्टर का क्या स्थान है, यह वर्तमान की राजनीतिक साधुता निर्धारित कर रही है।


भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के समय भी कुछ ऐसा ही हुआ, हालांकि यह कहना सही होगा कि प्रशासक के रूप में उनकी विरासत कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण थी। संसद के सेंट्रल हॉल में मंचित एक नाटकीय प्रहसन में अपने उपकारकर्ता (सोनिया गांधी) के ‘नहीं’ से पैदा हुए प्रधानमंत्री डॉ. सिंह एक शासक के रूप में सबसे कर्तव्यनिष्ठ थे। वह चुने गए व्यक्ति थे, और एक अमलकर्ता के रूप में उनके पास एक दुर्जेय पृष्ठभूमि थी। कर्तव्यनिष्ठ टेक्नोक्रेट मनमोहन सिंह अपने ऐतिहासिक सर्वश्रेष्ठ दौर में तब थे, जब उन्होंने अपने पहले गुरु, भारत के आर्थिक उदारीकरण के गुरु पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में वित्त मंत्रालय का दायित्व संभाला था। अराजकता और भ्रष्टाचार के बीच उनकी सौम्य दृढ़ता और उन्हें नौकरी देने वाले परिवार के प्रति उनकी अटूट निष्ठा ने डॉ. सिंह को मध्यम वर्ग का पसंदीदा बना दिया।


कुछ हद तक कार्टर की तरह, जब इतिहास उनके चारों ओर चक्कर लगा रहा था, तो वह शांत और विनीत बने रहे। सिंह की विरासत मृत्यु के साथ और भी बढ़ गई। सत्ता में रहते हुए उन्हें जो कुछ भी नहीं दिया गया, उसे पीछे मुड़कर देखने पर एक तरह की कृतज्ञता के रूप में उन पर बरसाया गया। जिस चीज ने इस प्रशंसा को मिथकीय प्रस्तावना बना दिया, वह था राजनीतिक संदर्भ: काश आज हमारे पास डॉ. सिंह होते! जबकि डॉ. सिंह के नेतृत्व वाले भारत की अस्वीकृति ने ही 2014 में मोदी को संभव बनाया, और इन 10 वर्षों में, सिंह युग बहुत दूर की कौड़ी लगता है। डॉ. सिंह को फिर से हासिल करने और लोकप्रिय चेतना में प्रतिष्ठित करने को, उनके पद से हटने के बाद आई राजनीतिक संस्कृति पहले ही अस्वीकृत कर चुकी है। कोई चीज इतिहास तब बनती है, जब इतिहास के मन बनाने से पहले की वह घट जाए। भविष्य में बैठकर ऐतिहासिक सच्चाइयों को नहीं बदला जा सकता।


वर्तमान राजनीतिक साधुता का फायदा, जिन्हें मिल रहा है, उनकी सूची में सिर्फ वे ही शामिल नहीं हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, बल्कि जो बाइडन जैसे लोग भी हैं, जो अभी जीवित हैं। बाइडन के सत्ता से बाहर होने के बाद, उनके एक बहुत ही साधारण राष्ट्रपति काल को असाधारण बनाने की कोशिशें की जा रही हैं। उत्सुक उदारवादियों की नजरों में, वह पहले से ही युद्धों और निरंकुशता से त्रस्त दुनिया पर छाई एक ऐतिहासिक शख्सियत हैं। अपनी ही पार्टी के दिग्गजों द्वारा दूसरी दौड़ से बाहर किए जाने के बाद, उन्हें पुरानी शालीनता से रहित माने जाने वाले ट्रंपीकृत अमेरिका में अंतिम सज्जन राजनेताओं के रूप में फिर से पेश किया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि ‘मेक जो बाइडन ग्रेट अगेन’ एक ऐसी परियोजना है, जो ट्रंप के डर से जरूरी हो गई है। एक गैर-ट्रंप का आविष्कार, भले ही भावी पीढ़ी के लिए एक शानदार गोलेम (जादू से जीवित की गई मिट्टी की मूर्ति) बनाने की कीमत पर हो, समय के साथ पूरी तरह से मेल खाता है। इतिहास को प्रतीक्षा करने दीजिए। मिथकों के निर्माण के राजनीतिक प्रयास तो चलते रहेंगे।

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