संविधान के अनुसार, सभी नागरिकों का लोकसभा और विधानसभाओं में सांसदों के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व होना चाहिए। पिछले 54 साल में आबादी 54 करोड़ से बढ़कर 145 करोड़ हो गई है। ऐसे में अगर सांसदों की संख्या को बढ़ाया नहीं गया, तो संसदीय प्रणाली में सांविधानिक असंतुलन बढ़ सकता है। वोट पाने के लिए नेता लोग विभाजनकारी सियासत करते हैं। लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों के पक्ष में विकास और गर्वनेंस के मजबूत तर्क हैं। उत्तर के चार राज्यों-उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में लोकसभा की 174 सीटें हैं, जो कुल सांसदों की 32 फीसदी हैं। जबकि दक्षिण भारत के पांच राज्यों-तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल और कनार्टक में 129 (24 फीसदी) सीटें हैं।
सीटें बढ़ाए बगैर अगर 543 सीटों का 2026 की जनगणना के अनुसार परिसीमन हुआ, तो उत्तर के चार राज्यों में 31 सांसदों की संख्या बढ़ जाएगी। जबकि दक्षिण के पांच राज्यों में 26 सीटें घटकर 103 हो सकती हैं। देश में जन्मदर के आंकड़ों के अनुसार, अगले तीस वर्षों में भारत में जनसंख्या वृद्धि का दौर खत्म हो सकता है। इसलिए स्टालिन अगले तीस वर्षों पर 1971 की जनगणना के आधार पर परिसीमन को जारी रखना चाहते हैं। मध्य मार्ग अपनाते हुए कुछेक लोग विधानसभा की सीटों का नवीनतम जनगणना के अनुसार परिसीमन करने का समर्थन कर रहे हैं। लेकिन ऐसा करने पर राष्ट्रपति चुनाव में विधायकों और सांसदों के मतों का मान और राज्यसभा में प्रतिनिधित्व में बड़ा असंतुलन हो सकता है।
आजाद भारत में 1951 की पहली जनगणना के बाद 1952 में परिसीमन आयोग ने लोकसभा और विधानसभाओं का भौगोलिक क्षेत्र निर्धारित किया था। उसके बाद 1962 और 1972 में परिसीमन किया गया। वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन से सरकार ने 2001 की जनगणना होने तक लोकसभा की सीटों को फ्रीज कर दिया। उसके बाद वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कानून मंत्री अरुण जेटली ने समय सीमा को 25 साल आगे बढ़ाकर 2026 कर दिया। लेकिन अनुसूचित जातियों और जनजातियों की सीटों के परिसीमन को 1991 की जनगणना के अनुसार किया गया।
अब 2026 की जनगणना के अनुसार, परिसीमन करने पर सांसदों की संख्या बढ़ाकर 848 की जाएगी, तो उत्तर के चार राज्यों में लगभग 150 सीटें बढ़कर कुल 324 हो जाएंगी। दूसरी तरफ, दक्षिण के राज्यों में सिर्फ 35 सीटें बढ़ेंगी। गृहमंत्री अमित शाह ने भरोसा दिलाया है कि समानुपातिक आधार पर परिसीमन से दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय नहीं होगा। लेकिन स्टालिन ने केंद्र से सवाल किया है कि समानुपातिक गणना के लिए किस आधार का इस्तेमाल होगा।
परिसीमन, महिला आरक्षण और जातिगत जनगणना के संवेदनशील विषय जुड़ते जाने से जनगणना में लगातार विलंब हो रहा है। वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने जनगणना पर 8,754 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया था, जो अब काफी बढ़ गया होगा। इस बार बजट में जनगणना के मद में सिर्फ 574 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ है, जो कुल खर्च के छह फीसदी से कम है। लोकसभा और विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने के लिए वर्ष 2023 में 106वें संविधान संशोधन के कानून का भविष्य भी अधर में लटका है।
नवीनतम जनगणना के अनुसार, परिसीमन नहीं करने के कई और नुकसान हैं। बड़े पैमाने पर गांवों से शहरों में पलायन करने वाले श्रमिकों के वोट गांव में होते हैं। ऐसे में वास्तविक आबादी के बजाय पंजीकृत मतदाताओं के आधार पर परिसीमन करने से संसद में शहरी क्षेत्रों का सही प्रतिनिधित्व नहीं हो रहा है।
इस विवाद में संसद, सरकार और नेताओं के बयानों के बीच बड़ा विरोधाभास नजर आ रहा है। दो बच्चों के कानून के लिए भाजपा सांसद राकेश सिन्हा ने राज्यसभा में प्राइवेट बिल पेश किया था। फिर 2022 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल ने भी जनसंख्या नियंत्रण पर कानून की बात कही थी। एनएचएफएस-5 के सर्वे के अनुसार, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में जन्म दर 1.7 है, जबकि उत्तर प्रदेश में 2.35 और बिहार में तीन की सर्वोच्च जन्मदर है। इसलिए अब दक्षिण भारत के नेता लोगों से आबादी बढ़ाने की बातें कर रहे हैं।
दक्षिण में स्टालिन परिसीमन रोकने की मांग कर रहे हैं, तो बिहार के चुनावों में जातिगत जनगणना का मुद्दा प्रबल रहेगा। 'जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उतनी उसकी भागीदारी' का नारा अब परिसीमन की बहस में ओझल हो गया है। लेकिन इस मुद्दे पर सरकार के सामने कुआं और खाई की स्थिति है। दक्षिणी राज्यों की मांग में दम है कि प्रतिनिधित्व के लिए जनसंख्या के साथ, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार नियोजन, गवर्नेंस, जीडीपी में योगदान और आर्थिक विकास की उपलब्धियों का मूल्यांकन होना चाहिए। विकास के मोर्चे पर अच्छा काम करने वाले राज्यों को दंड मिलना ठीक नहीं है। लेकिन 2047 में ‘विकसित भारत’ बनाने की चर्चा के दौर में 1971 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करना संविधान के लिहाज से ठीक नहीं है।