1989 की उन घटनाओं का महाद्वीप और विश्व के भविष्य के लिए क्या अर्थ है, इसका आकलन करने के लिए ग्रांटा में यूरोपीय मूल के 15 लेखकों से लेख लिखवाए थे। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ समय में हुई घटनाओं को लेकर कई लेखक खुश भी थे। इनमें पूर्वी जर्मनी के पादरी वर्नर क्रेशेल शामिल थे, जिन्होंने दीवार गिराने वाली ‘आजादी और सम्मान’ के संघर्ष को सलाम किया। प्रसिद्ध चेक उपन्यासकार इवान क्लिमा का मानना था कि जिन असंतुष्टों ने अधिनायकवाद को समाप्त करने में मदद की थी, उनके पास ‘पारस्परिक घरेलू शांति में रहने वाले यूरोप के विचार को साकार करने की शक्ति थी।’
यूरोप में होने वाले बदलावों को सकारात्मक नजरिए से देखने वालों में राजनीतिक सिद्धांतकार इसायाह बर्लिन भी शामिल थे, जो पुराने लेखक होने के साथ अंग्रेजी बोलने वाली दुनिया के प्रसिद्ध व्यक्ति भी थे। रूस में जन्मे बर्लिन बचपन में ही परिवार के साथ ब्रिटेन चले गए थे। उन्होंने 1989 की घटनाओं में पुराने साम्यवाद द्वारा दमन किए गए बुद्धिजीवियों की उदार परंपराओं का पुनरुत्थान देखा। उन्होंने लिखा, “रूसी महान हैं। उनके पास अपार रचनात्मक शक्तियां हैं और एक बार मुक्त होने के बाद यह कहना मुश्किल हो सकता है कि वे दुनिया को क्या दे सकते हैं। एक नए प्रकार की बर्बरता हमेशा संभव है, लेकिन मुझे वर्तमान में इसकी संभावना बेहद कम दिखाई देती है कि बुराई पर विजय प्राप्त की जा सकती है और दासता को खत्म किया जा सकता है, जिन पर मनुष्य सही मायने में गर्व कर सकता है।”
अन्य लेखकों ने भी पूर्वी यूरोप में सोवियत के कठपुतली शासन के पतन का स्वागत किया, लेकिन वे भविष्य को लेकर बहुत आशावादी नहीं थे। चेक गणराज्य में जन्मे और कई सालों तक कनाडा में रहे लेखक जोसफ स्कोवोरेस्की ने लिखा, “यूरोप में अधिनायकवादियों के दिन गिने-चुने रह गए हैं। अन्य जगहों पर ऐसा लगता है कि वे नहीं रहे, कुछ जगहों पर तो वे अभी-अभी शुरू हुए हैं।” आलोचक जॉर्ज स्टीनर ने टिप्पणी की, “हम हर जगह, राष्ट्रवाद, बढ़ती जातीय घृणा के बीच एक अंधी दौड़ देख रहे हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि “अमेरिका द्वारा यूरोप की अनेदखी के बाद भी यूरोप अपने दम पर खड़ा है।”
पूर्वी यूरोप में जो कुछ भी हुआ, वह पोलिश, चेक, मैग्यार और जर्मन द्वारा दबाई गई राष्ट्रवादी भावनाओं की अभिव्यक्ति थी, जो सोवियत शासन का विरोध कर रहे थे, जबकि कुछ योगदानकर्ताओं ने तो इन छोटे यूरोपीय राष्ट्रों के उदय का जश्न मनाया। ग्रांटा में लिखे लेख में आंद्रेई सिन्यावस्की ने चेतावनी दी कि राष्ट्रवाद के प्रतिक्रियावादी और मुक्तिदायी परिणाम भी हो सकते हैं। इसकी सबसे अधिक संभावना रूस में थी। वह भले ही साम्राज्य से वंचित था, लेकिन अपने गौरव से नहीं। उन्होंने लिखा, “राष्ट्रवाद स्वयं में किसी राष्ट्र के लिए कोई गंभीर खतरा तब तक नहीं हो सकता, जब तक वह बिना किसी ठोस आधार के अपने ‘शत्रु’ न बनाना शुरू कर दे। उन्होंने आगे कहा, अब रूसी राष्ट्रवादियों ने ‘रूसोफोबिया’ को जन्म दिया है, जो ‘बुर्जुआ घुसपैठ’ के लेनिनवादी-स्टालिनवादी विचार का संशोधित रूप है। रूसोफोबिया स्टालिनवाद का वह भयानक रूप है, जो ‘लोगों का दुश्मन’ और ‘वैचारिक तोड़-फोड़ करने वाला’ है।
बर्लिन और सिन्यावस्की की टिप्पणियां छपने के 35 साल बाद भी उन्हें एक साथ पढ़ने पर ऐसा लगता है कि एक के आशावाद और दूसरे के संदेह के बीच का अंतर चौंकाने वाला है। इसका कारण दोनों की अलग सोच हो सकती है। उन्हें पता था कि रूसी राष्ट्रवाद में किस तरह विदेशी-द्वेष और अंधराष्ट्रवादी प्रवृत्तियां थीं। कम से कम रूस के मामले में तो सिन्यावस्की, बर्लिन से ज्यादा सटीक साबित हुए हैं। दशकों से सत्ता पर काबिज व्लादिमीर पुतिन ने पहले अपने लोगों को गुलाम बनाना शुरू किया, फिर उन देशों के लोगों को गुलाम बनाने की कोशिश की, जो सोवियत संघ के टूटने के बाद आजाद हुए थे। रूस की यह साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा यूक्रेन पर हमले में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, हालांकि पुतिन की नजर कुछ छोटे यूरोपीय देशों पर भी है।
पिछले कुछ हफ्तों में हुए घटनाक्रम बताते हैं कि ग्रांटा में योगदान करने वालों में जॉर्ज स्टीनर दूरदर्शी थे। उनका मानना था कि समय के साथ अमेरिका यूरोप के प्रति उदासीन हो जाएगा। हालांकि यह डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पुतिन की प्रशंसा से पहले से ही जगजाहिर था, लेकिन कम ही लोगों ने सोचा था कि दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही ट्रंप यूक्रेन के खिलाफ इतने आक्रामक हो जाएंगे। राष्ट्रपति ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस द्वारा वोलोदिमीर जेलेंस्की का सार्वजनिक रूप से मजाक उड़ाने का रूसी राजनेताओं और प्रचारकों ने स्वागत किया है। ट्रंप इसका अनुमान शायद ही लगा पाए होंगे कि यूक्रेन के यूरोपीय सहयोगी इतनी जल्दी उस संकटग्रस्त देश की मदद के लिए आगे आ जाएंगे। व्हाइट हाउस में ट्रंप और जेलेंस्की के बीच हुई इस तीखी नोकझोंक के लाइव प्रसारण के कुछ ही घंटों के भीतर यूरोपीय संघ के विदेश मामलों और सुरक्षा नीति की उच्च प्रतिनिधि काजा कलास ने सोशल मीडिया पर पोस्ट की- ‘यूक्रेन यूरोप है! हम यूक्रेन के साथ खड़े हैं। हम यूक्रेन की मदद करते रहेंगे, ताकि वह रूस के खिलाफ लड़ाई जारी रख सके। आज यह स्पष्ट हो गया है कि स्वतंत्र विश्व को एक नए नेता की जरूरत है। यह हमारे ऊपर है कि हम इस चुनौती को स्वीकार करें।’
मौजूदा कार्यभार संभालने से पहले कलास एस्टोनिया की प्रधानमंत्री रह चुकी हैं। यह छोटा, लेकिन आत्मसम्मान वाला बाल्टिक गणराज्य है। यह कभी सोवियत शासन के अधीन था। पुतिन अब भी इस पर अपनी नजरें गड़ाए हुए हैं। हालांकि कलास की विद्रोही पोस्ट से भी अधिक महत्वपूर्ण ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर द्वारा यूक्रेन के प्रति दिखाई गई एकजुटता थी। उन्होंने जेलेंस्की को अपने आधिकारिक निवास पर आमंत्रित कर उन्हें वह सम्मान देने की पेशकश की, जो उन्हें व्हाइट हाउस में नहीं दिया गया था। इसके बाद यूरोपीय नेताओं की एक बड़ी बैठक हुई, जिसमें यूक्रेन की संप्रभुता के प्रति अपने समर्थन की पुष्टि की गई।
इन सबके बावजूद यूरोपीय राजनेताओं को यह पता है कि उनके पास यूक्रेन को रूसी हमले से बचाने के लिए सैन्य शक्ति का अभाव है। लेकिन उन्हें अब भी इस बात की उम्मीद है कि ट्रंप यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य सहायता को अचानक वापस लेने के अपने फैसले पर एक बार फिर से विचार करेंगे। शायद वह अमेरिकी कंपनियों को यूक्रेन के बहुमूल्य खनिज संसाधनों का दोहन कर उससे लाभ कमाने का लालच भी दे सकते हैं।
हालांकि मैं इस कॉलम को उस संगोष्ठी की एक टिप्पणी के साथ समाप्त करना चाहूंगा, जो स्टीनर और सिन्यावस्की की टिप्पणियों से भी अधिक दूरदर्शी थी। यह टिप्पणी पूर्वी जर्मन असंतुष्ट लेखक जुरेक बेकर की थी, जिसमें कहा गया था, “पश्चिमी समाज का कोई विशेष लक्ष्य या उद्देश्य नहीं है। अगर कोई मार्गदर्शक सिद्धांत है, तो वह है उपभोक्तावाद। सैद्धांतिक रूप से हम अपनी खपत को तब तक बढ़ा सकते हैं, जब तक कि आसपास के क्षेत्र खंडहर न हो जाएं।” वर्तमान रुझानों को देखते हुए लगता है कि ऐसा ही होगा।