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राजनीति भी बदल रही है

नीरजा चौधरी
Updated Thu, 28 May 2020 07:37 AM IST
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महाराष्ट्र के सोलापुर में लॉकडाउन के दौरान जन धन खाते में सरकार की ओर से डाली जाने वाली राहत राशि लेने के लिए सड़क किनारे बैठकर इंतजार करते लोग। - फोटो : PTI

महाराष्ट्र सरकार के एक वरिष्ठ सचिव ने टिप्पणी की, 'जबसे मैं नौकरी में आया हूं, तभी से कंप्यूटरीकरण के बारे में सुना है। लेकिन कोविड- 19 ने तेजी से बदलाव किए हैं और पिछले ढाई महीनों में हमने जो कुछ भी देखा है, वह पिछले 25 वर्षों में नहीं हुआ था।' आवश्यकता आविष्कार की जननी है। आज निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज हो गई है। वह दौर चला गया, जब फाइलें बनाई जाती थीं, और निर्णय पर अंतिम हस्ताक्षर होने में कभी-कभी हफ्तों लग जाते थे।



आज व्हाट्सऐप से एक नोट भेजा जाता है और दो घंटे के भीतर हस्ताक्षर के साथ वह वापस लौट आता है। अब यह नया मानदंड बनने जा रहा है। लोग घर से काम कर रहे हैं और भविष्य में इसमें और तेजी आएगी। बच्चे पहले से ही डिजिटल लर्निंग के जरिये घर से पढ़ाई कर रहे हैं, मगर गरीब परिवारों और ऐसे पिछड़े क्षेत्रों के बच्चे, जहां वाईफाई नहीं है या कनेक्शन कमजोर है, पिछड़ जाएंगे, यदि उनके लिए सामुदायिक रेडियो या टीवी कार्यक्रमों के माध्यम से सीखने की सुविधा नहीं दी जाती।


राजनीति भी बदलाव के दौर से गुजर रही है। तब्लीगी मामले को सांप्रदायिक रूप देने की कोशिश को छोड़कर भाजपा का हिंदुत्व एजेंडा भी कम से कम थोड़े समय के लिए पीछे चला गया है। ऐसा लगता है कि वह कोई दूसरा युग था, जब भाजपा ने एनआरसी-एनपीआर-सीएए को अपना प्रमुख मुद्दा बना लिया था, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बना दिया था और अपने मुख्य एजेंडे को पूरा करने के लिए अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी हासिल की थी।


आज ज्यादा चिंताजनक विषय ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और वे हैं-भूख, स्वास्थ्य, लाखों प्रवासियों की घर वापसी और सबको खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती। खाद्य सुरक्षा अधिनियम को सामने आई नई जरूरतों के संदर्भ में तत्काल संशोधित करने की आवश्यकता होगी। प्रवासी श्रमिक देश में कोविड के खिलाफ जंग की परिभाषित छवि बने रहेंगे।


वे गरीबों की एक नई जाति के रूप में उभरे हैं, जो लंबे समय से शहरी भारत में उपेक्षित हैं। लॉकडाउन की घोषणा करते समय सरकार को उनकी प्रतिक्रिया का अनुमान नहीं था। अब सरकार को उनके लिए एक रोडमैप तैयार करना होगा और उनकी समस्याएं दूर करने के लिए एक विशेष मंत्रालय की स्थापना पर विचार करना चाहिए। देश विभाजन के बाद विस्थापित प्रवासियों के पुनर्वास के लिए एक विभाग था, जब लाखों लोग नए घर की तलाश में यहां चले आए थे।


केंद्र और राज्यों, दोनों के सामने आने वाली चुनौतियों की व्यापकता को देखते हुए कुछ लोग महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए धार्मिक कार्ड खेलने की कोशिश करेंगे। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पहले ही कह चुके हैं कि वह एक जून से पूजा करने वालों के लिए धार्मिक स्थान खोलना चाहते हैं। हर कोई जानता है कि धार्मिक समारोहों में इकट्ठा होने के कारण ही इटली, दक्षिण कोरिया और ईरान में कोरोना मामलों में भारी वृद्धि हुई थी। 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कठोर कदम उठाते हुए शुरुआत की और लॉकडाउन की घोषणा करने में एक दिन की भी देरी नहीं की। लेकिन बाद में सरकार ‘स्वास्थ्य’ बनाम ‘अर्थव्यवस्था’ की दुविधा में फंस गई। ऐसा संभवतः अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी के दबाव और घरेलू स्तर पर उद्योग एवं व्यापार जगत के दबाव के कारण हुआ।
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हालांकि यह बहुत ही अक्षम्य और चिंताजनक है कि न तो केंद्र और न ही राज्यों ने पर्याप्त चिकित्सा और अस्पताल में सुविधाएं विकसित कीं, जिसे लॉकडाउन के दौरान किए जाने की अपेक्षा थी। और न ही बड़े पैमाने पर परीक्षण किया जा रहा है। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री ने अब भी अपनी छवि नहीं खोई है, ऐसा अनिवार्यतः इसलिए है कि शीर्ष स्तर पर वह अब भी विश्वास पैदा करते हैं।


लॉकडाउन में ढील देने के साथ संक्रमितों की संख्या में वृद्धि के बावजूद यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि मामला हाथ से बाहर जा रहा है। लेकिन कमजोर विपक्ष और चुनाव में चार साल का समय मोदी के लिए फायदेमंद है। विपक्षी दलों को सरकार के कार्यों की आलोचना करने और 'नकारात्मकता' के बीच संतुलन बनाना होगा। विपक्षी दलों के बीच एक राय भी नहीं है।


सोनिया गांधी ने हाल में 22 विपक्षी दलों की बैठक बुलाई, जिसका सपा, बसपा ने बहिष्कार किया, जो अब भी कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में खतरे के रूप में देखती हैं। उस बैठक में सरकार के 20 लाख करोड़ के आर्थिक 'प्रोत्साहन' और अप्रवासी नीति पर एक प्रस्ताव पारित किया गया, जो कार्रवाई के लिए आह्वान के बजाय आलोचनात्मक ज्यादा था।


पिछले कुछ समय से विपक्षी पार्टियों की 'ट्वीटर राजनीति' से आगे नहीं बढ़ने के लिए आलोचना हो रही है। सोशल डिस्टेंसिंग की जरूरत को देखते हुए अब सामूहिक राजनीति और कठिन होने वाली है, हालांकि सोनिया गांधी ने सरकार को उस समय रक्षात्मक होने के लिए मजबूर कर दिया, जब उन्होंने प्रस्ताव दिया कि कांग्रेस प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाने के लिए किराये का भुगतान करेगी। और प्रियंका गांधी ने प्रवासी मजदूरों को अपने गांव पहुंचाने के लिए राजस्थान-उत्तर प्रदेश सीमा पर 1,000 बसें खड़ी कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पर दबाव बनाया।


जब प्रधानमंत्री ने पांच बार मुख्यमंत्रियों के साथ संपर्क किया, तो कुछ समय के लिए लगा कि सहकारी संघवाद सामने आ रहा है, लेकिन यह खुशमिजाजी थोड़े समय के लिए रही। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब केंद्र और महाराष्ट्र व केरल सरकार के बीच इस बात को लेकर तकरार चल रही है कि ट्रेन एवं विमान सेवा शुरू करने से पहले उनसे सलाह नहीं ली गई। कोविड-19 के खिलाफ जंग ने मुख्यमंत्रियों की स्थिति मजबूत की है।


ज्यादातर मुख्यमंत्री, खासकर गैर एनडीए दलों के, खुद अपने आप काम कर रहे हैं। आज मुख्यमंत्री और उनके नौकरशाहों ने कमान संभाली हुई है। मजबूत प्रधानमंत्री और मजबूत पीएमओ का मोदी मॉडल राज्यों में दोहराया जा रहा है। मंत्रियों, सांसदों, विधायकों की भूमिका और प्रासंगिकता कम होती जा रही है। कोविड-19 के साथ, हम विभिन्न स्तरों पर सत्ता के अधिक से अधिक केंद्रीकरण की ओर अग्रसर हो सकते हैं और प्रतिवाद करने वाली ताकतें कमजोर हो सकती हैं। यह हमारे लोकतंत्र या भारतीय राजनीति के लिए अच्छा नहीं होगा।

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