कहते हैं, अंत भला तो सब भला। जो भी निराशावादी भाजपा में दरार की भविष्यवाणी कर रहे थे, वे चुप हो गए हैं। पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी का धमाकेदार इस्तीफा कुछ घंटे के भीतर बिना किसी रिरियाहट के वापस हो चुका है। एक नए नेता के अभिषेक को पुरानी पीढ़ी ने स्वीकार कर लिया है।
भाजपा नेता शायद हमें यह बताना चाहते हैं कि विशाल हिंदू परिवार अब एक खुशहाल संयुक्त परिवार बन गया है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?
भाजपा के अंदरूनी झगड़े की गूंज पहले से ही पार्टी के बाहर सुनाई दे रही है। मुख्य सहयोगी जनता दल (यू) ने, जो नरेंद्र मोदी को लेकर हमेशा सावधान रहा है, अपनी आपत्ति जता दी है और शीघ्र ही गठबंधन से अलग होने का संकेत भी दे दिया है। इससे कुछ क्षेत्रीय दलों में आशा का संचार हुआ है और वे फेडरल फ्रंट को लेकर काफी शोर मचा रहे हैं, मगर जन्म से पहले ही इसके अंतर्विरोध नजर आ रहे हैं।
उधर यूपीए सत्ता संघर्ष के लिए कमर कस रहा है। पहले से ही कयास लगाए जा रहे हैं कि लोकसभा चुनाव समय से पहले आगामी विधानसभा चुनावों के साथ हो सकते हैं। सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक को जल्दी से जल्दी पारित कराना चाहती है, क्योंकि वह इसे भ्रष्टाचार और कुशासन जैसे आरोपों की काट के तौर पर देख रही है। सत्तारूढ़ गठबंधन का मानना है कि मनरेगा की तरह यह रामबाण साबित होगा।
जहां तक भाजपा का सवाल है, नरेंद्र मोदी का उदय विकल्पहीनता के एहसास का नतीजा था। ऐसा नहीं है कि हिंदुत्व के इस पोस्टर बॉय से संघ परिवार को कोई समस्या नहीं है। न केवल संघ, बल्कि विश्व हिंदू परिषद जैसे सहयोगी संगठन भी मोदी के कामकाज की 'ढीठ एवं अभिमानी' शैली से असहज महसूस करते हैं।
यह जगजाहिर है कि बहुतों से प्रेम और नफरत पाने वाला यह नेता लोकतांत्रिक साख के लिए नहीं जाना जाता है। उनकी छवि एक 'उदार तानाशाह' की है। विडंबना यह है कि आजादी के बाद कांग्रेस द्वारा थोपी गई वेस्टमिनिस्टर प्रणाली के बावजूद मध्यवर्गीय हिंदुओं का एक बड़ा तबका हमेशा एक उदार तानाशाह का आकांक्षी रहा है और नेताजी सुभाषचंद्र बोस या सरदार पटेल जैसे सख्त, देशभक्त और निर्णायक नेता को पसंद करता है।
पिछले नौ वर्षों के दौरान ज्यादातर मामलों में, चाहे वह भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित हों या चीन-पाकिस्तान से संबंधित, सत्तारूढ़ गठबंधन के अनिर्णय को देखकर इस वर्ग को एक ऐसे मसीहा की तलाश है, जो आर्थिक विकास को गति देने के साथ विदेशी संबंधों में सख्ती दिखाए और आतंकवाद एवं नक्सलवाद जैसी आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों से भी प्रभावी ढंग से निपट सके।
उच्च और निम्न वर्ग के बारे में कहा जाता है कि राजनीतिक घटनाक्रम से उसे मतलब नहीं होता। गरीबों ने खुद को भगवान भरोसे छोड़ रखा है, तो अमीरों को लगता है कि कोई भी सरकार उनकी अनदेखी का जोखिम नहीं उठा सकती। मगर जहां तक मोदी की बात है, तो उन्हें उद्योग-समर्थक के रूप में देखा जाता है।
भाजपा के सिर्फ हिंदुत्व पर भरोसा करने वाले खेमे में मोदी एक ऐसे नेता माने जाते हैं, जो हिंदू अस्मिता से समझौता नहीं करेगा। जबकि हिंदुत्व आंदोलन के सारथी आडवाणी धर्मनिरपेक्ष बनने एवं प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में व्यापक स्वीकार्यता हासिल करने की कोशिश में (चाहे वह जिन्ना प्रकरण हो या अयोध्या के विवादित ढांचे के ध्वंस से खुद अलग करने के) हिंदुओं का विश्वास खो चुके हैं।
गोधरा कांड के बाद राज्य की हिंसक घटनाओं के लिए माफी न मांगने, छद्म-धर्मनिरपेक्षता एवं तुष्टिकरण की राजनीति से इनकार करने, सद्भावना यात्रा के दौरान मुस्लिम टोपी पहनने से मना करने और विधानसभा चुनाव में एक भी अल्पसंख्यक को टिकट नहीं देने के कारण 'हिंदू हृदय सम्राट' के रूप में मोदी की स्थिति मजबूत ही हुई है।
भाजपा के लिए मोदी एक ऐसा विचार है, जिसका समय, अपनी कमियों के बावजूद अब आ चुका है।
मगर मोदी की राह आसान नहीं है। आडवाणी की प्रतिक्रिया तो उन अवरोधों की शृंखला का पहला मामला था, जिनसे उन्हें पार्टी के भीतर आने वाले दिनों में दो-चार होना है। पार्टी के भीतर प्रधानमंत्री पद के आकांक्षी नेता उनकी राह में रोड़े अटकाने के लिए कुछ भी करेंगे। मोदी को प्राथमिकता के स्तर पर कूटनीतिक तरीके से इनसे निपटना होगा।
जिस तरह गुजरात में मोदी को पार्टी से संबंधित सभी फैसले लेने का अधिकार हासिल था, क्या वह सुविधा उन्हें केंद्र में मिलेगी? अगर उनके पंख कतर दिए गए, तो क्या वह पार्टी को अपेक्षित सफलता दिला पाएंगे? इसके अलावा, कई राज्यों में कद्दावर क्षेत्रीय क्षत्रप हैं, जहां भाजपा का कोई अस्तित्व ही नहीं है। अपने तमाम आकर्षण और लोकप्रियता के बावजूद मोदी अकेले भाजपा को जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंचा सकते।
अपनी ध्रुवीकृत छवि के साथ क्या मोदी नए सहयोगियों को जोड़ पाने में और मौजूदा सहयोगियों को प्रभावित कर पाने में कामयाब होंगे? क्या वह अपने कामकाज की कथित तानाशाही शैली के साथ लोगों को जोड़ पाएंगे? क्या वह समावेशी विकास मॉडल से ग्रामीण इलाकों के मतदाताओं, औद्योगिक कामगारों, अल्पसंख्यकों एवं पिछड़े वर्ग को लुभा पाने में सक्षम होंगे?
मोदी के लिए लड़ाई तो अभी शुरू हुई है। उन्होंने पटेल की प्रतिमा निर्माण के लिए देश भर से लोहा इकट्ठा करने का प्रस्ताव रखा है, पर राष्ट्र निर्माण के लिए उन्हें उससे ज्यादा लोहा चाहिए, जो बिल्कुल अलग तरह का खेल है।