जिस बात के लिए पुलिस अधिकारी का भी सम्मान होना चाहिए, उसके लिए विभागीय जांच शुरू करवा दी गई है। यदि किसी सिपाही ने भैंसों की ठीक से देखभाल की है, तो यह पुलिस विभाग के लिए गर्व की चीज है।
पुलिस तो मनुष्यों की ठीक से देखभाल न करने के लिए बदनाम है, ऐसे में किसी सिपाही (साहब) का पशु-प्रेम जागृत हो गया है, तो यह पुलिस में क्रांतिकारी बदलाव है। वैसे तो कहा यह भी जाता है कि पुलिस तो मनुष्यों के साथ भी जानवरों की तरह पेश आती है, मगर यहां तो वह जानवर के सामने मनुष्य की तरह खड़ी है।
पुलिस अधिकारी पर यह भी आरोप है कि उसने सरकारी घर में भैंस पाली। क्यों भाई... कोई अफसर यदि कुत्ता पाल ले, बिल्ली पाल ले, तो कुछ शिकायत नहीं होती।
अरे, आस्तीन में सांप भी पाल ले (यानी अपराधी) तो भी उंगली नहीं उठती, मगर भैंस पाल ली, तो क्या अपराध हो गया? अब यह तो कहिए मत कि भैंस पाली तो पाली, उसका दूध भी बेचा! क्योंकि भैंस है, तो दूध देगी ही (कुत्ता, बिल्ली, तोता नहीं देता, तो कोई क्या कर सकता है) और दूध बेचें नहीं, तो क्या करे! चार लोगों के परिवार में क्या दस-बीस लीटर दूध खपता है?
पहली बात तो यही तय होना चाहिए कि भैंस पालना गलत है या उसका दूध बेचना। मुझे तो लगता है कि अफसर ने थाली का घी थाली में ही रहने दिया और भैंस का दूध, सरकारी कैंटीन को बेचा। यह तो उस अफसर की अपने विभाग पर आस्था का नमूना है, वरना पुलिसवालों को चीज बेचने का जोखिम कोई नहीं उठाता।
मेरे शहर में तो पेट्रोल पंप वालों ने पुलिस की उधारी से तंग आकर धंधा ही बंद कर दिया। कह सकते हैं कि पुलिस वाला कभी पुलिस वाले का पैसा हजम नहीं करता है- अफसर का तो बिलकुल ही नहीं। रिश्वतखोरी के इस खुले माहौल में यदि कोई अफसर दूध बेचकर गुजारा कर रहा है, तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए।
उस सिपाही को भी पदक मिलना चाहिए और वह पुलिस में पशु-प्रेम जगा रहा है, इसीलिए उसे पेटा की तरफ से ईनाम दिलवाया जाना चाहिए।
पशु-प्रेम से गुजरते हुए पुलिस, इंसान-प्रेम तक पहुंच जाएगी, यह उम्मीद जाग रही है, तो उसे जांच की दवा से फिर सुलाने की कोशिश हो रही है। लिहाजा पुलिस प्रेम-मोहब्बत, सद्भावना, मानवता से यदि परहेज करती है, तो क्या गलत करती है। कुछ गलत नहीं करती!