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फेरबदल का सियासी संदेश

Mon, 04 Sep 2017 09:53 AM IST
नीरजा चौधरी
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मंत्रिमंडल फेरबदल
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल का जो विस्तार और उसमें फेरबदल किया है, उसके कई महत्वपूर्ण संकेत हैं। यह पूरी कवायद न्यू इंडिया विजन और 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर हुई है। जहां तक विस्तार की बात है, तो वह ज्यादातर राज्य मंत्रियों के स्तर पर हुआ है, जबकि विभागों के फेरबदल में मंत्रियों के कामकाज को देखकर कदम उठाया गया। सुरेश प्रभु के इस्तीफे की पेशकश का उदाहरण सामने रखकर अन्य मंत्रियों को इसके लिए प्रेरित किया गया, जिसके चलते कुछ मंत्रियों ने पहले ही इस्तीफा दे दिया था।
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मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल से ठीक पहले चार प्रमुख केंद्रीय मंत्रियों की बैठक भी दर्शाती है कि सरकार में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं था। सूत्रों के मुताबिक, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली व नितिन गडकरी  इस पक्ष में नहीं थे कि उनका विभाग बदला जाए। अपुष्ट सूत्रों से मिली खबर के मुताबिक, राजनाथ सिंह ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर उनका विभाग बदला जाता है, तो वह पार्टी संगठन में काम करना पसंद करेंगे। माना जा रहा है कि संघ के दबाव में उनका विभाग नहीं बदला गया है।

सबकी नजरें इस पर टिकी थीं कि रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाती है। अपुष्ट सूत्रों से ऐसी भी खबरें आ रही थीं कि सुषमा स्वराज की रक्षा मंत्रालय में दिलचस्पी थी, पर प्रधानमंत्री ने सबको हैरानी में डालते हुए निर्मला सीतारमण को रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी। निर्मला सीतारमण जेटली कैंप की नेता मानी जाती हैं और राज्यमंत्री के रूप में उनका कामकाज अच्छा माना गया, इसलिए संभवतः उन्हें प्रमोशन मिला। निर्मला सीतारमण को पहली महिला रक्षा मंत्री बनाकर जहां मोदी ने महिलाओं को प्राथमिकता देने का संदेश दिया है, वहीं सुषमा स्वराज से परहेज भी दिखाया है।
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शपथ लेने वाले राज्य मंत्रियों में चार पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं, जिन्हें शासन का अच्छा अनुभव है। वे अलग-अलग मंत्रालय में अपने कैबिनेट मंत्रियों को अपने अनुभव के आधार पर  प्रभावी सहयोग करेंगे। पूर्व गृह सचिव आर के सिंह को तो राज्य मंत्री के रूप में स्वतंत्र प्रभार दिया गया है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपनी नई टीम बनाने के कदम के रूप में देखा जा सकता है। इससे संकेत मिलता है कि प्रधानमंत्री नौकरशाहों और पेशेवरों के साथ काम करने में ज्यादा बेहतर महसूस करते हैं। गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए भी वह नौकरशाहों पर ज्यादा भरोसा करते थे। यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का झुकाव प्रेसिडेंशियल सिस्टम के तत्वों की तरफ ज्यादा है। चुनाव चाहे कोई भी हो, उसे तो वह अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव की तरह लड़ ही रहे हैं।

मंत्रिमंडल में यह बदलाव ऐसे समय पर हुआ है, जब 2019 के चुनाव का काउंटडाउन शुरू होने में पंद्रह-सोलह महीने ही बचे हैं और अर्थव्यवस्था में गिरावट के संकेत हैं। उद्योग जगत में निराशा है, छात्रों, किसानों और युवाओं में असंतोष बढ़ रहा है तथा रोजगार सृजन की दिशा में भी महत्वपूर्ण सफलता हाथ नहीं लगी है। न्यू इंडिया के विजन को सफल बनाने तथा 2019 के लोकसभा चुनाव में मिशन 350 का लक्ष्य हासिल करने के मद्देनजर यह फेरबदल महत्वपूर्ण है।

भावी चुनावी संभावना की दृष्टि से उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए काफी महत्वपूर्ण है। जबसे वहां योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया है, तब से वहां के ब्राह्मणों की नाराजगी के संकेत मिल रहे थे। पिछले कुछ समय से भाजपा में दलितों एवं अन्य पिछड़ी जातियों को काफी तवज्जो दी गई, इससे भी ब्राह्मण समाज नाराज था। इस फेरबदल के जरिये जातिगत समीकरण को साधकर संतुलन बनाने की कोशिश की गई है।

उत्तर प्रदेश में जहां कलराज मिश्र को हटाकर शिव प्रसाद शुक्ला को मंत्री बनाया गया है, वहीं बिहार में अश्विनी चौबे को मंत्री बनाया गया है और ये दोनों ब्राह्मण समाज से हैं। बिहार में राजीव प्रताप रूडी को हटाकर, जो राजपूत हैं, दूसरे राजपूत आर के सिंह को मंत्री बनाया गया है। उसी तरह जाट समुदाय के संजीव बालियान को हटाकर सत्यपाल सिंह को मंत्री बनाया गया है। दलित एवं ओबीसी राजनीति के बाद अब भाजपा ने सवर्ण जाति को खुश करने और जातिगत संतुलन बनाने की कोशिश की है।

केंद्रीय मंत्री के रूप में शपथ लेने वाले पहले मंत्री धर्मेंद्र प्रधान थे, जबकि शपथ लेने वाले मंत्रियों का क्रम वर्णमाला के अनुसार नहीं था। यह संकेत है कि भाजपा ओडिशा विधानसभा चुनाव में धर्मेंद्र प्रधान को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बना सकती है। कर्नाटक से अनंत कुमार हेगड़े को मंत्री बनाया गया है, जो हिंदुत्व का चेहरा माने जाते हैं। इससे संकेत मिलता है कि कर्नाटक चुनाव में भाजपा हिंदुत्व को अपना प्रमुख मुद्दा बना सकती है। मध्य प्रदेश में टीकमगढ़ के सांसद वीरेंद्र कुमार को मंत्री बनाया गया है, जो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी माने जाते हैं। यह एक और संकेत है कि भाजपा अपने मुख्यमंत्रियों को छेड़ना नहीं चाहती, जिसे अमित शाह ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था।

इस मंत्रिमंडल विस्तार की कमजोरी यह कि है इसमें जदयू और शिव सेना जैसे सहयोगी दलों को साथ नहीं लिया गया, जिससे भविष्य में गठबंधन में नाराजगी दिख सकती है। हालांकि दोनों पार्टियों से मंत्री बनाए जाने की संभावनाएं पहले व्यक्त की जा रही थीं, लेकिन शायद किसी बिंदु पर सहमति नहीं बन पाई।। संभवतः नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपने सहयोगी दलों को यह संदेश देना चाह रहे हों कि हम सहयोगी दलों के दबाव में नहीं आने वाले हैं। लेकिन अगर भाजपा ने 2019 के लिए मिशन 350 का लक्ष्य रखा है, तो उसके लिए अपने सहयोगी दलों को साथ लेकर चलना जरूरी होगा। निश्चित रूप से जदयू और शिवसेना में इसको लेकर नाराजगी होगी, पर फिलहाल उनके पास कोई चारा नहीं है और अगर भविष्य में गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस किसी गठबंधन के बनने की संभावना बनेगी, तो उससे भाजपा के मिशन 350 पर असर पड़ सकता है।
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