पिछले सप्ताह जिस दिन मुंबई बारिश के पानी में डूब गई थी, उस दिन वॉट्सएप पर मुझे किसी ने शहर के प्रसिद्ध केईएम अस्पताल की एक तस्वीर भेजी, जिसमें मरीजों के डूबे हुए पलंग दिखाए गए थे और पानी में आधे डूबे हुए उनके परिजन भी। तस्वीर के साथ ये शब्द लिखे थे, ‘यह है हाल केईएम अस्पताल का और इस सरकार की प्राथमिकताएं देखिए कि शिवाजी की विशाल प्रतिमा पर 4,000 करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है। शिवाजी अगर आज जीवित होते, तो अवश्य गौरवान्वित होते।’ बात वास्तव में प्राथमिकताओं की है। मुंबई महानगर का दुर्भाग्य है कि जब भी वहां कोई आपदा आती है, तो ऐसा लगता है कि सरकार की प्राथमिकताएं आम नागरिकों की प्राथमिकताओं से बिल्कुल अलग हैं।
वर्ष 1993 में मुंबई में शृंखलाबद्ध बम विस्फोट हुए थे, जिसमें करीब 300 लोग मारे गए थे। उसके बाद वहां चुनाव हुए तथा शिवसेना-भाजपा की पहली गठबंधन सरकार बनी। पर उस सरकार की प्राथमिकता सुरक्षा नहीं थी। बॉम्बे नाम बदल कर मुंबई रखना उसकी प्राथमिकता में था। इसी तरह 26/11 के आतंकवादी हमले के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार की प्राथमिकता मारे गए लोगों के परिजनों के आंसू पोंछने के बजाय एक फिल्म निर्देशक को ताज होटल की बर्बादी दिखाना थी। पिछले सप्ताह जब बारिश से मुंबई बदहाल थी, तब सरकार की प्राथमिकता खुद को निर्दोष साबित करने की थी। राजनेता यही कहने में लग गए कि न नगरपालिका पर दोष डाला जा सकता है, न महाराष्ट्र सरकार पर। उनकी तैयारी पूरी थी, उस दिन बारिश ही कुछ ज्यादा हो गई थी।
मुंबई जैसे महानगरों के प्रशासनिक ढांचे में पूरी तरह परिवर्तन लाने का समय क्या नहीं आ गया है? देश के कई महानगरों की आबादी आज छोटे देशों की जनसंख्या से ज्यादा है, फिर भी इनका प्रशासन दूर बैठे मुख्यमंत्रियों के हाथों में है, जबकि न्यूयॉर्क, लंदन और पेरिस जैसे महानगरों को शक्तिशाली महापौर चलाते हैं, जिन्हें जनता के वोटों से चुना जाता है। न्यूयॉर्क में जब 9/11 का आतंकवादी हमला हुआ था, तो उस शहर को दोबारा जीवित करने की सारी जिम्मेदारी तत्कालीन महपौर की थी। उतने बड़े हादसे के बाद भी वह थोड़े ही दिनों में न्यूयॉर्क में सामान्य स्थिति बनाने में सफल रहे थे। ऐसा मुंबई में भी होता, अगर इस महानगर का शासन एक शक्तिशाली महापौर के हाथों में होता।
जितना बुरा हाल भारत के शहरों का है, शायद ही किसी अन्य देश के शहरों का होगा। इसका मुख्य कारण है कि हम अब भी शहरों को पुराने प्रशासनिक ढांचों द्वारा चला रहे हैं, जो तब बनाए गए थे, जब इन शहरों की जनसंख्या लाखों में ही हुआ करती थी, करोड़ों में नहीं। परिवर्तन लाने की शुरुआत मुंबई से होनी चाहिए, क्योंकि यह भारत की व्यावसायिक राजधानी है। पर प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता हर भारतीय शहर को है।
ये सुधार जल्दी नहीं लाए जाते, तो वह दिन दूर नहीं, जब भारत माता एक विशाल झुग्गी-बस्ती का रूप धारण कर लेगी। मुंबई का हाल यह है कि आधे से ज्यादा लोग झुग्गियों में रहते हैं, जहां बिजली-पानी की सुविधाएं भी नहीं हैं और जहां नगरपालिका के सफाईकर्मी कदम ही नहीं रखते। अगर हम प्रशासनिक सुधारों को प्राथमिकता नहीं बनाते, तो अन्य शहरों का भी यही हाल होनेवाला है। प्रधानमंत्री पिछले सप्ताह मुंबई आए होते, तो उन्हें महसूस होता कि स्वच्छ भारत का उनका सपना तभी साकार होगा, जब शहरों में प्रशासनिक सुधार होंगे।