यह सिर्फ संयोग नहीं है कि 1929 में लाहौर में जब कांग्रेस द्वारा ‘पूर्ण स्वराज्य’ का प्रस्ताव पारित किया जा रहा था, उसी समय कोलकाता के हुगली कॉलेज में प्रसिद्ध दार्शनिक प्रोफेसर कृष्ण चंद्र भट्टाचार्य भारत में 'विचारों में स्वराज' लाने की जरूरत का प्रतिपादन कर रहे थे। वह अंग्रेजों द्वारा स्थापित शिक्षा के अंतर्गत तेजी से पनप रही भारत की सांस्कृतिक गुलामी से मुक्ति के लिए आवाहन कर रहे थे। उनके अनुसार विचारों और भावों की दुनिया में एक नई और कदाचित असंगत सोच भारतीयों पर लादी जा रही थी।
उन्हें लग रहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तो स्पष्ट दिखाई पड़ती है, पर जिस तरह भिन्न विदेशी विचारों का प्रभुत्व विचारों के स्तर पर हावी होता है, वह छिपा होता है, पर अचेतन में पहुंच कर गहरे असर करता है। नियति की विडंबना यह कि भारत के तत्कालीन भद्रलोक ने शायद स्वयं के पिछड़े होने की चिंता में इस आयातित सोच को चाहा और अच्छा भी माना। भट्टाचार्य का मानना था कि आधुनिक शिक्षा के अंतर्गत अपने विगत प्राचीन इतिहास, वर्तमान के यथार्थ और भविष्य के लक्ष्य के लिए कोई सृजनात्मक दृष्टि नहीं मिलती।