सुषमा स्वराज के अचानक चले जाने के बाद अरुण जेटली का निधन गहरे धक्के से कम नहीं है। पिछले पांच वर्षों से उनका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था। एक भद्र जन, जो अपनी बात पूरी स्पष्टता के साथ कहता था। वह अच्छे नियोजक थे और राजधानी के मीडिया के साथ उनका ताल्लुक बहुत सहज था। हाजिरजवाबी और वन लाइनर के साथ उनके चेहरे पर हमेशा छाई रहने वाली मुस्कराहट, भूली नहीं जा सकेगी।
जेटली 2012 से ही नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की पैरवी कर रहे थे और इसकी रणनीति में भी शामिल थे। वास्तव में जब गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री मोदी ने मई, 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री का पद संभाला तब जेटली ने शुरुआती दो महीने तक नई दिल्ली की नौकरशाही को समझने में उनकी मदद की। वह लहरों के विपरीत तैरना जानते थे। 2013 में जब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में लालकृष्ण आडवाणी के नाम पर विचार हो रहा था और जब मोदी ने बातचीत के लिए नई दिल्ली आने से इनकार कर दिया था, तब यह अरुण जेटली ही थे, जो उन्हें गांधीनगर से नई दिल्ली लेकर आए थे।