उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री ने कुछ दिनों पहले एक थाने का निरीक्षण किया, पुलिस को आपराधिक तत्वों के साथ सख्ती से निपटने का आदेश दिया और विशेषज्ञों से अपराध से निपटने के लिए सलाह मांगी। उनकी इस शुरुआती पहल पर तुरंत अमल होना चाहिए। अभी तक उत्तर प्रदेश में हिंसात्मक, कठोर और कई बार गैरकानूनी पुलिस व्यवस्था के जरिये अपराध से निपटा गया है। वर्ष 2012-13 की रिपोर्ट के अनुसार, 47 हजार मानवाधिकार शिकायतों के साथ मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है। इसके बाद भी पिछले पांच वर्षों में यह देश के कुल अपराध के मामलों में सबसे ऊपर है।
इसमें कोई रहस्य नहीं कि प्रदेश में कुछ लोगों के अपराध को वर्षों तक अनदेखा किया जाता है या ताकतवर लोगों के इशारे पर अचानक अनुचित तरीके से जांच शुरू की जाती है। पुलिस, राजनेता और स्थानीय माफिया की मिलीभगत लोगों को कानून हाथ में लेने और जाति व धर्म के आधार पर निजी सेना विकसित करने की इजाजत देती है। इसने महिलाओं और अन्य कमजोर समूहों पर अत्याचार को बढ़ावा दिया है। इसने अल्पसंख्यकों को विमुख कर दिया है और इससे पुलिस के प्रति लोगों का भरोसा घटा है।
ऐसा नहीं है कि कुछ ताकतवर लोगों के इशारे पर नाचने से पुलिस को लाभ हुआ है। कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के ऐसा करने से बेहतर पोस्टिंग और प्रमोशन मिल सकता है, पर बड़े पैमाने पर वरिष्ठ अधिकारियों को समझौते करने पड़ते हैं और उन्हें मनमाने तरीके से परेशान किया जाता है। उत्तर प्रदेश में आईपीएस अफसरों के तबादले की दर राष्ट्रीय औसत से चार गुना ज्यादा है। यह स्थिति तब है, जब ग्यारह वर्ष पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि प्रोन्नति, पदस्थापन और तबादले का निर्णय प्रबंधन के हाथों में होना चाहिए, न कि राजनीतिक आकाओं के हाथ में।
वर्ष 2015 में कर्तव्य निर्वहन के दौरान सबसे ज्यादा पुलिस की मौत उत्तर प्रदेश में हुई। जो जीवित हैं, उनके स्वास्थ्य और उनकी दक्षता का कोई भी अनुमान लगा सकता है। पुलिस स्टेशनों को सबसे कम प्राथमिकता मिलती है, जबकि लोग मदद के लिए पहले वहीं पहुंचते हैं। पुलिस बजट का एक फीसदी से कुछ ही ज्यादा उनके प्रशिक्षण पर खर्च होता है, और कुल आधुनिकीकरण अनुदान का मुश्किल से सात फीसदी ही भवन व हार्डवेयर के लिए इस्तेमाल होता है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि उत्तर प्रदेश में पुलिस बल में 1.5 लाख से ज्यादा रिक्तियां हैं, जिनमें से 11,000 सब-इंस्पेक्टर स्तर के पद खाली हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में पुलिस की संख्या दोगुना करने की आवश्यकता है। हालांकि कागज पर महिला पुलिस अधिकारी के लिए 20 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है, पर राज्य में पांच फीसदी से भी कम महिला पुलिस अधिकारी हैं। यह स्थिति उस राज्य में है, जहां 2010 से 2015 के बीच महिलाओं के खिलाफ अपराध में 61 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
कहने का मतलब यह कि अपराध से निपटने की तुलना में पुलिस व्यवस्था सुधारने की ज्यादा जरूरत है। इसके लिए पहले भी रूपरेखा तैयार की गई और कई तरह की सिफारिशें की गई हैं। वर्ष 2006 में उत्तर प्रदेश कैडर के ही पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि-द्विपक्षीय नीति बनाएं और कार्य प्रदर्शन निकाय का गठन करें, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की कार्यकाल तक सुरक्षा सुनिश्चित करें, पदोन्नति, पदस्थापन और तबादले से संबंधित कार्यों को वरिष्ठ प्रबंधन के हाथों में सौंपें और इसकी पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएं, जांच से कानून-व्यवस्था की बहाली को अलग करें, और सबसे जरूरी यह कि एक नए पुलिस शिकायत प्राधिकार के जरिये पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित करें।
उत्तर प्रदेश की सरकारों ने कुछेक अध्यादेशों को पारित किया है, जो अदालत के आदेश के अनुपालन का ढोंग करते हैं, लेकिन इनमें से कोई भी कानून जमीनी स्तर पर बदलाव नहीं ला पाया है। पदस्थापन और तबादले अब भी राजनेताओं द्वारा दिया जाने वाला उपहार है, न तो कार्य की निश्चित अवधि है और न ही पुलिस शिकायत प्राधिकार है, जिसे अदालत ने राज्य और जिला स्तरों पर स्थापित करने की आवश्यकता बताई थी।
लेकिन मूल संरचनात्मक बदलाव किए बगैर उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री सिर्फ कुछ व्यावहारिक बदलाव के साथ ही पुलिस व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार कर सकते हैं। रिक्तियों को भरने के अलावा वह लोगों, स्टाफ, रिकॉर्ड्स, अभियुक्त और जांचकर्ताओं के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराकर पुलिस स्टेशनों का उन्नयन कर सकते हैं। हिरासत में उत्पीड़न रोकने के लिए वह लॉक-अप को 24 घंटे सीसीटीवी से लैस कर सकते हैं, जो मुख्यालय से जुड़ा होगा। हिरासत में हिंसा के दोषी पुलिस को दंड दे सकते हैं, यौन अपराधों से निपटने के लिए प्रत्येक पुलिस स्टेशनों में पर्याप्त महिला पुलिस अधिकारी सुनिश्चित कर सकते हैं, पीड़िता की सहायता के लिए परामर्श दाताओं, चिकित्साकर्मियों एवं पुलिस के बीच तालमेल बिठा सकते हैं, पुलिस तंत्र के भीतर मौजूद कु्ख्यात अर्दली व्यवस्था को खत्म कर सकते हैं, तैनाती को तर्कसंगत बना सकते हैं, आठ घंटे की पारी प्रणाली को बढ़ा सकते हैं, महिला पुलिसकर्मियों की विशेष जरूरतों का शीघ्र उपाय तलाश सकते हैं, प्रशिक्षण व्यवस्था को दुरुस्त कर सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होगा।
ज्यादा वाहनों और लाठियों के साथ पुलिस को तैयार करने और बिना जवाबदेही सुनिश्चित किए उनकी कार्य-संस्कृति में सुधार से पुलिस व्यवस्था में बदलाव नहीं आएगा, बल्कि वह और दमनकारी बन जाएगा। मुख्यमंत्री ने पुलिस तंत्र में मौजूद सड़ांधों को दूर करने के लिए कुछ शुरुआती कदम उठाए हैं, लेकिन उनके ऊपर नई पुलिस व्यवस्था बनाने की भारी जिम्मेदारी है। पुलिस लोगों की सेवा करने के लिए होती है, वह स्वयं में कानून नहीं है। क्या ऐसा हो पाएगा?