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थाने वाले साधु-संत

Thu, 15 Nov 2012 10:30 PM IST
प्रकाश पुरोहित
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आज मैं बहुत ही निराश हूं। क्या सोचा था, और क्या हो गया। यकीन नहीं हो रहा कि इतने दिनों से मैं एक गलतफहमी के सहारे था। वह तो भला हो पुलिस महकमे के बड़े साहब का, जिन्होंने बताया है कि पुलिस में सारे साधु-संत नहीं होते हैं। यह कड़वा सच बोलने का साहस भी कोई साधु-संत ही कर सकता है। वरना मैं तो यही समझ रहा था कि पुलिस में भरती ही उनको किया जाता है, जो साधु-संत होते हैं। मैं ऐसे किसी पुलिसवाले की कल्पना ही नहीं कर सकता, जो साधु या संत नजर नहीं आता हो।
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साधु-संतों के सरगना यानी बड़े साहब को संत-शिरोमणि की उपाधि देने का मन हो रहा है कि उन्होंने अपनी कमजोरी खुद बताते हुए हमारी बंद आंखें खोल दीं। पुलिस के बारे में अफवाहें तो लोग उड़ाते रहते हैं, मगर यह यकीन हमेशा रहा कि यहां सिर्फ साधु-संत ही रहते हैं। अब साधु-संतों में जो बातें होती हैं, वे पुलिस में हर समय नजर आती हैं, इसलिए ऐसी धारणा बन गई है। साधु-संत के बारे में कभी आपने सुना है कि वह दस से पांच प्रतिशत ही साधु-संत होता है? नहीं न, सो पुलिसवाला भी पूरे समय पुलिसवाला रहता है।

ड्यूटी पर है, तो भी और घर में है, तो भी। महान लोगों के यही लक्षण होते हैं कि सुख-दुख में वे समान रहते हैं। और फिर साधु-संतों से महान कौन हो सकता है। वह थाने में जनता को ठीक करता है, तो घर में बीवी-बच्चों को! वह बदलता नहीं!
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थाने को घर भले ही न बना सके, मगर घर को थाना बनाने में वह देर नहीं करता है। लगता यही है कि वह थाना साथ लिए ही चलता है- साधु-संतों की धूनी की तरह! इस तरह का निस्पृह भाव ही उन्हें साधु-संतों की कतार में रखता है। साधु-संत भी क्या करते हैं, यही न कि समाज से बुराई दूर हो- पुलिस भी इसी में लगी रहती है कि बुराई इस थाने से खत्म हो। पड़ोस में जाएगी, तो वे निपट लेंगे- जैसे जिलाबदर!

समाज को सुरक्षित रखने वालों का आप वेतन सुन लें, तो यकीन नहीं करें कि इस तनख्वाह में कोई परिवार, तो क्या खुद भी पल सकता है। साधु-संत जिस तरह ‘चढ़ावे’ के भरोसे रहते हैं, पुलिस को भी इसी का आसरा रहता है। वरना कोरी तनख्वाह पर पुलिसवाला बनना तो साधु-संत बनने से भी मुश्किल काम है। साधु-संतों का ड्रेस-कोड समान होता है, तो पुलिसवाले भी सस्पेंड होने पर ही सिविल ड्रेस में आते हैं, वरना पूरी उम्र उनकी कल्पना वरदी में ही होती है।
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