इस वर्ष के शुरुआती तीन महीने मैंने दुनिया के अन्य हिस्सों, खासकर इंग्लैंड में कल्याणकारी राज्यों के उदय के बारे में अध्ययन करने में खर्च किए। मेरे अध्ययन का एक महत्वपूर्ण सूत्र समाज के परस्पर विरोधी वर्गों में आम सहमति का विकास था, हालांकि नाजुक एवं मुश्किल होने के बावजूद ऐसा हो सकता है, जैसे कंजर्वेटिव, लिबरल और लेबर पार्टी के बीच हुआ। इसका उल्लेख निकोलस टिमिन्स की पुस्तक द फाइव जॉइन्ट्स में हुआ है।
इसके कई कारकों में से एक कारक द्वितीय विश्वयुद्ध था। जहां तक इंग्लैंड की बात है, तो तथ्य यह है कि जब वहां पर बम गिराए गए, तो अमीरों और गरीबों में कोई मतभेद नहीं किया गया और वे सभी बमों से होने वाले नुकसान के सहभागी बने। सहमति और द्वितीय विश्वयुद्ध से संबंधित दूसरा पक्ष यह था कि इंग्लैंड द्वारा युद्ध की घोषणा से कुछ दिन पहले एक सितंबर, 1939 को 35 लाख बच्चों को घर से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। (बेन विलिस की पुस्तक नो टाइम टू वेव गुडबॉय) इसका मतलब यह कि लंदन के गरीब बच्चे ग्रामीण इंग्लैंड के समृद्ध परिवारों और वैसे ही अन्य परिवारों के साथ रहने चले गए।
कुछ बच्चों ने दूध पीने से मना कर दिया, क्योंकि उन्होंने गायों को दुहते हुए देखा था और उन्हें लगता था कि वह गौमूत्र है। जो बच्चे शौचालयों से अपरिचित थे, उन्होंने पॉश महिलाओं की कालीनों पर पेशाब कर दिया। अमीर लोगों को पहली बार गरीबों की स्थिति से सामना करना पड़ रहा था और इसने कुछ हद तक उन्हें गरीबों की हालत के प्रति सहानुभूति विकसित करने में मदद की।
भारत में जिस शत्रुतापूर्ण माहौल में कल्याणकारी राज्य पर बहस होती है, वह काफी चौंकाने वाली है। प्रभावशाली अभिजात वर्ग के बीच सहानुभूति की कमी विस्मयकारी है। मसलन, हाल ही में जब मीडिया दलित अत्याचार पर रिपोर्टिंग करने लगा, तो दर्शकों/पाठकों ने मीडिया पर मुद्दे के राजनीतिकरण का आरोप लगाया।
मैं अपने देश के लोगों में सहानुभूति की इस कमी को देखकर हैरान रह गई, जिन्होंने असंवेदनशीलता दिखाई। जैसा कि मुझे महसूस होता है, इसका एक कारण यह है कि वे आबादी के एक बड़े हिस्से के दैनिक जीवन की क्रूर वास्तविकताओं से अपरिचित रहे हैं। हम अपने जीवन में व्यस्त रहते हैं। टीआरपी के प्रति उत्सुक मीडिया सूचना साझा करने की भूमिका में पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं है। सोशल मीडिया, जो संभवतः ज्यादा लोकतांत्रिक हो सकता है, दुख की बात है कि आम लोगों की पहुंच में नहीं है।
पिछले वर्ष मुझे ग्लेन ग्रीनवाल्ड की पुस्तक नो प्लेस टु हाइड पढ़ने का मौका मिला, जिसमें एडवर्ड स्नोडेन के बारे में एक टिप्पणी पढ़कर मैं हैरान रह गई। उसमें लेखक ने कहा है कि स्नोडेन (उनकी पीढ़ी के दूसरे लोगों के लिए भी) की नैतिकता के दायरे के विकास में वीडियो गेम ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हाल ही में जब स्थान आधारित संवर्धित वास्तविक गेम पोकेमॉन गो सुर्खियों में था, जिसमें खिलाड़ी जीपीएस के जरिये अपने आसपास के आभासी किरदारों के प्रति सतर्क रहते हैं, मैं सोचने लगी कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इसी खेल की तरह समृद्ध भारतीय यह देखने के लिए अपने वातानुकूलित घरों से बाहर निकलें कि आखिर आम भारतीय किस तरह से गुजर-बसर करते हैं। क्या इस गेम के किरदार दिल्ली के मॉलों के बजाय बस्तियों में नहीं छिप सकते, खिलाड़ियों को दिल्ली परिवहन निगमों की बसों का इंतजार करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते और वे बस्ती के निवासियों के बीच नहीं चल सकते, जो पानी के लिए कतार में खड़े रहते हैं। या फिर इवासोर (डायनासोर की तरह का एक चौपाया पोकेमॉन) दिल्ली के किसी फ्लाईओवर के नीचे हो, ताकि खिलाड़ी देख सकें कि फ्लाईओवर के नीचे किस तरह के लोग रहते हैं और कैसे गुजर-बसर करते हैं।
पोकेमॉन के शौकीन एक जज को जन वितरण प्रणाली की दुकानों तक खींचकर लाने के बारे में क्या विचार है, ताकि वह देख सकें कि उनके आधार कार्ड से संबंधित आदेशों का किस तरह से उल्लंघन हो रहा है और यह देख सकें कि जन वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार को कम करने के बजाय बॉयोमीट्रिक प्रमाणीकरण कैसे भ्रष्टाचार के दरवाजे खोल सकता है। क्या ओडिशा के स्थानीय आंगनवाड़ी में चार्मंडर (पोकेमॉन का एक किरदार, जिसकी पूंछ में आग लगी होती है) प्रकट नहीं हो सकता, जहां कहा जाता है कि बच्चों को अंडे खिलाए जाते हैं और प्री-स्कूल शिक्षा दी जाती है। उत्तर प्रदेश के स्थानीय सरकारी स्कूल में एक जिजागून (पोकेमॉन का एक किरदार) छिप सकता है, जहां खिलाड़ी यह देखें कि शिक्षक कक्षा में एक छड़ी के साथ आते हैं या जहां एक दलित बच्चे की बेवजह पिटाई होती है। क्या होगा अगर पंपकाबू और गौरजिस्ट (दोनों पोकेमॉन के किरदार) मनरेगा मजदूरों द्वारा तैयार किसी खेत में जाकर बैठे हों, ताकि खिलाड़ी यह जान सके कि 'गड्ढा खोदना' भी कुछ मायनों में उत्पादक कार्य हो सकता है? जिन दिनों राशन का बंटवारा होता है, बटरफ्री (पोकेमॉन का एक अन्य किरदार) को मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ की किसी जन वितरण प्रणाली की दुकान में छिपने दीजिए। अनंत संभावनाएं हैं!
यहां मिले-जुले अनुभवों को सूचीबद्ध किया गया है-कभी-कभी और कुछ जगहों पर सरकार का हस्तक्षेप कारगर होता है, तो किसी अन्य जगह पर यह विनाशकारी भी हो सकता है। ऑनलाइन ट्रॉल सेना के कई सदस्य कड़वाहट से भरे महसूस होते हैं और करदाताओं की तरह धोखा देते हैं। जैसे ही ट्रॉल्स पिकाचु की खोज में अपनी सेना में वृद्धि करते हैं, तो वह यह देख सकते हैं कि टैक्स के रूप में उनके दिए गए पैसे का अच्छा इस्तेमाल हो रहा है। और कौन जानता है कि चीजें गलत हैं, वे और रचनात्मक तरीके से उसे शामिल करने में सक्षम हो सकते हैं। समकालीन भारत में अगर पोकेमॉन गो हमारे लिए कुछ कर सकता है, तो वही, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बच्चों को सुरक्षित घर देने के लिए किया गया था।
लेखिका आईआईटी, दिल्ली में पढ़ाती हैं