सड़क पर इतनी भीड़ रहती है
कि जुलूस के लिए जगह नहीं
देखने से
दिखने की समझ में जो जगह बनती है
समझ में भी जगह नहीं बची
भीड़ बढ़ गई लगता
या मैटनी शो छूटा!
भीड़ से घटकर
जनता अकेली एक बची
मैं जब भी उससे मिलता
तो गिनती में दो होता
सड़क पर
हम दोनों जब मिलते
दो की जुलूस में मिलते
सबकी, सुख-दुख की बात करते
कभी कुछ जोर से नारे में बात करते।
नींद पर भरोसा
अब मैं उठने के लिए
केवल नींद पर भरोसा करता हूं
अपनी नींद पर
किसी दूसरे पर नहीं
जब उठना होता है तो
नींद खुल जाती है
जागना चाहता हूं तो नींद नहीं आती
रात भर जागूं तो रात भर नींद नहीं आएगी
जब नहीं सोता तो
जम्हाई भी नहीं आती
नींद के भरोसे को आजमाने के लिए बकायदा बिस्तर बिछाकर
मच्छरदानी लगा लूंगा
ओढ़ने के लिए चादर की जरूरत पड़ेगी तो चादर भी रख लूंगा
तब भी मुझे नींद नहीं आएगी
और नींद पर मुझे भरोसा है
इसलिए मैं सबके लिए कहता हूं
नींद तुम रात के अंत तक रहना
और रात तुम भी तब तक रहना
जब तक थके-मांदों की नींद रहे।
(विनोद कुमार शुक्ल, वरिष्ठ कवि। समाज को सिखाने नहीं, समझने की कोशिश में जन्म लेती है इनकी कविता)