निर्भया, अमानत, दामिनी। कितने नाम दिए थे हमने भारत की उस बेटी को, जिसको जिंदा रखने के लिए सारे देश ने इतनी दुआएं मांगी थीं। नहीं बचा सकीं उसे हमारी दुआएं, लेकिन उसकी मौत एक दर्पण बन गई है, जिसमें हम देख सकते हैं अपने राजनेताओं के असली चेहरे। जो लोग उसके जिंदा रहते हुए अपने घरों में छिपे बैठे रहे, चोरों की तरह, सिंगापुर के अस्पताल में उसकी मौत की खबर मिलते ही उसको इस दुनिया से विदा करने की तैयारी में ऐसे लग गए जैसे कि इससे महत्वपूर्ण कोई काम न हो।
भारत के दोनों सबसे बड़े राजनेता प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी ठंड और धुंध की परवाह न कर सुबह-सुबह निकले अपने घरों से और अंधेरे में एयरपोर्ट पहुंचे, उसकी वापसी के इंतजार में। जब उसके परिवार वालों से मिले, तो अफसोस करने के बाद उन्होंने सरकारी मदद दी, उनकी बेटी के अंतिम संस्कार के लिए, ताकि जल्दी-जल्दी सब कुछ समाप्त किया जाए। ताकि न पत्रकारों तक खबर पहुंचे और न ही उन प्रदर्शनकारियों तक, जो 15 दिनों से न्याय की दुहाइयां मांगते फिर रहे थे दिल्ली की सड़कों पर।
शायद ऐसा करने का फैसला इन दोनों राजेताओं ने इसलिए लिया, क्योंकि उन्हें चिंता थी लोगों के भड़क जाने की, आक्रोश के हिंसा में बदल जाने की। अगर प्रधानमंत्री और सोनिया जी के सलाहकार समझदार होते, तो उनको जरूर समझाते कि ऐसा करने से जो दूरियां जनता और उनके बीच बन गई थी इस घिनौने बलात्कार के बाद, वह दूरियां और भी बढ़ जाएंगी। समझाने को ढेर सारी बातें और भी थी। घटना इतनी भयभीत करने वाली थी, इतनी शर्मनाक और दिल दहलाने वाली कि हम और आप चाहते थे कि इस देश के बड़े राजनेता हमारे दर्द और शर्मिंदगी को महसूस करें।
हमारे साथ, कंधा से कंधा मिलाकर खड़े होकर दुहाई मांगें, हमारे आक्रोश को समझने की कोशिश करें। ऐसा क्यों नहीं किया किसी भी राजनीतिक दल के एक भी नेता ने? पिछले दिनों इन सवालों के जवाब मैंने अपने कई राजनीतिक दोस्तों से मांगे और सच तो यह है कि किसी ने मुझे ऐसा जवाब नहीं दिया है आज तक, जिससे मैं संतुष्ट हुई। इसका एक जवाब मिला तब, जब मैं राज्यसभा के एक सदस्य से गुजरात के चुनावों के बारे में बात कर रही थी।
जनाब सेक्यूलर राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं, सो मुझे समझाने की कोशिश कर रहे थे, कि क्यों नरेंद्र मोदी कभी इस देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। मैंने जब उनसे कहा कि मैं जहां जाती हूं, वहां मुझे मिलते हैं ऐसे शहरी नौजवान मध्यवर्गीय भारतीय, जो मोदी को बहुत पसंद करते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, 'वह इसलिए कि ऐसे कई लोग हैं, जो अब भारत की बागडोर देना चाहते हैं एक सशक्त राजनेता के हाथो में। तंग आ गई है जनता कमजोर राजनेताओं से।'
यह बात आजकल वे लोग भी मानते हैं, जो सोनिया गांधी का दिल से आदर करते हैं और जो चाहते हैं कि 2014 में राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन जाएं। उनको भी समझ में नहीं आता है कि क्यों राहुल जी ने एक बार भी इंडिया गेट तक जाने की कोशिश नहीं की प्रदर्शनकारियों के साथ दो बातें करने या जरा-सी सहानुभूति जताने के लिए। सोनिया जी का घर इंडिया गेट के इतने पास है कि पैदल भी अगर जातीं, तो 10 मिनट लगते। तो क्यों नहीं गईं उन पहले दिनों में, जब नारेबाजी भी शांति से हो रही थी और जब हिंसा का सवाल ही नहीं था? क्या इसलिए कि असली राजनीतिक नेतृत्व को न भारत की सबसे बड़ी राजनेता खुद समझ पाई हैं और न ही अपने पुत्र को समझा सकी हैं?
कठिनाई की ऐसी घड़ियां इस सरकार के लंबे शासनकाल में बहुत कम आई हैं। एक तो तब आई थी, जब 26/11 वाला हमला मुंबई पर हुआ था और दूसरी बार तब जब अन्ना हजारे को जेल में डालने के कारण देश के शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए थे। और अब जब राजधानी की एक बस में एक बच्ची के साथ ऐसा बलात्कार किया छह दरिंदों ने कि उसकी जान ही चली गई। इन कठिनाई की घड़ियों में एक बार भी हमने देश के सबसे बड़े राजनेताओं का वह नेतृत्व नहीं देखा, जिसकी उम्मीद थी। लेकिन इस बार जितने डरपोक, कमजोर और बेदर्द साबित हुए हैं देश के नेता, शायद पहले नहीं हुए थे कभी। क्या इस कमजोरी को, राजनीतिक नेतृत्व के इस गंभीर अभाव को, भूल सकेंगे भारतवासी 2014 के आम चुनावों तक? मुश्किल लगता है दोस्तों, बहुत मुश्किल, और न ही भूल पाएंगे हम उस बच्ची को, जिसकी शिक्षा के लिए उसके पिता ने अपने खेत बेचे थे।