साल-दर-साल
होलिका जलाते-जलाते
एक दिन तुम अपनी नववधुओं को जलाने लगे
साल-दर-साल
नगर के बड़े मैदान में
या सब से ज्यादा खुले चौराहे पर
रावण-दहन के हर्षध्वनि करते तमाशाई बने तुम
टोले और बस्तियां फूंकने का पूर्वाभ्यास करते रहे
कहने को तो तुम्हारे यज्ञों में बलियां बंद हो चुकी हैं कब की।
ज्ञानेंद्रपति, वरिष्ठ कवि-इनकी कविताएं चुपके से रास्ता बनाती हुई जिंदगी में दाखिल होती हैं और फिर चेतना को झकझोरती हैं।