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ये जो दिल्ली है...

Sun, 13 Jan 2013 03:45 PM IST
सुदीप ठाकुर
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चेतन भगत को मिली फटाफट कामयाबी ने अनेक आईटी और मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स को लिखने के लिए प्रेरित किया है। बीते कुछ वर्षों के दौरान तेज रफ्तार जिंदगी और उससे भी तेज कामयाबी के बीच बनते-बिगड़ते अंतरंग रिश्ते जरूरी नहीं कि वह प्रेम ही हो, टूटती वर्जनाएं, पैसे का बढ़ता प्रभुत्व और महानगरीय कुंठा को पिरोकर कहानी के रूप में परोसने वालों की बाढ़ सी आ गई है।
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एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से जुड़े विनोद नायर के बारे में यह बात दावे से तो नहीं कही जा सकती, और ऐसा कहना उन्हें कमतर आंकने जैसा भी होगा, मगर उनकी किताब दिल्ली ओएमजी ( ओह माई गॉड) को पढ़ते हुए बार-बार चेतन भगत याद आते हैं।
 
यों दिल्ली को केंद्र में रखकर ढेरों किताबें लिखी गई हैं, मगर खुद विनोद नायर ने इस शहर को बहुत करीब से देखा है और जिया है। दिल्ली ओएमजी! का नायक दिनेश एक खांटी मलयाली माता-पिता की संतान है, मगर दिल्ली में पले-बढ़े होने के कारण वह एक पक्का 'डेलहाइट' है।
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दिनेश इस किताब का नायक ही नहीं है, बल्कि समकालीन दिल्ली से रू-ब-रू कराने वाला सूत्रधार भी है। उसकी कहानी नेताजी नगर के टाइप-चार सरकारी क्वार्टर में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के जमाने से शुरू होती है और खुद के खरीदे डीएलएफ के फ्लैट में 46 इंच के एलसीडी टीवी के साथ खत्म होती है। पिता के रिटायर होने के बाद उसके अभिभावक तो केरल चले जाते हैं, मगर वह दिल्ली में ही रह जाता है।

इसके बाद उसका संघर्ष शुरू होता है, जिसमें उसे दिल्ली के अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं। एक दिल्ली दिनेश के पंजाबी टैक्स सलाहकार की है, जिसे अधेड़ उम्र में विवाहेतर संबंध से गुरेज नहीं और एक दिन जिसकी पत्नी खुदकुशी कर लेती है, तो एक दिल्ली उसके एक बिहारी मकान मालिक की है, जिसकी बेटी अमेरिका जाना चाहती है। एक दिल्ली जीबी रोड में सजने वाली देह की मंडी की है, जहां दिनेश एक छोटी बच्ची को देखकर हताश हो जाता है।

दिनेश के जरिये विनोद नायर ने दिल्ली के विभिन्न रंगों और उसके अंतरविरोधों को सामने लाने की कोशिश की है। वह इस शहर के मिजाज को खूब समझते हैं और दिल्ली के विभिन्न हिस्सों का इतिहास भी बताते चलते हैं। मसलन, 1930 तक करोल बाग का इलाका जंगलों से घिरा हुआ था या मुगलों के समय जीबी रोड में पांच बड़े चकलाघर थे, या फिर खान मार्केट को 1950 के दशक में विभाजन के बाद आए शरणार्थियों के लिए बसाया गया।

इसके साथ ही वह दिल्ली के उस चेहरे से भी नकाब उतारते चलते हैं, जिसमें एक तंदूर है, जिसमें सुशील शर्मा ने अपनी पत्नी को जिंदा जला दिया था, या फिर सियासी हलकों में कभी रसूख रखने वाला रोमेश शर्मा है, जिसका सफर अंततः तिहाड़ में खत्म होता है। दिल्ली को लेकर लिखी गई यह एक दिलचस्प किताब है।
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किताब : दिल्ली ओएमजी!
लेखक: विनोद नायर
प्रकाशक: ओम बुक्स इंटरनेशनल
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