सुबह तिरी मुस्कान सी लगती है ,
तू मुझ को आज़ान सी लगती है
कहीं से भी मैं तुझको पढ लूँ ,
ग़ालिब का दीवान सी लगती है
तेरी नफासत का मैं कायल ,
तू उर्दू ज़बान सी लगती है
मेरी शायरी में सिर्फ तू है ,
तू सारा जहान सी लगती है
न सुबह हुई , न शाम हुई है ,
जब भी तू परेशान सी लगती है
जब भी तुझे आँखों से चूमा ,
तू मुझको कुरआन सी लगती है