वह पीठ पर बैठा रहता
और उतर कभी भी सामने आ जाता
वक्त बे वक्त किसी भी वक्त,
दोस्तों के बीच की गपशप हो
किसी से तू-तू, मैं-मैं हो
या किन्ही खास निजी पलों की गुफ्तगू
कहीं भी बच्चों के हाथ से छूटी गेंद सा उछल
कभी भी टपक पड़ता
खास तौर पर फुरसत के दौरान
वह बड़े आराम से
पीठ से उतर सामने आ जाता
पहाड़ी मौसम सा पल पल मिजाज बदलता
कभी किताब के पिलियायें पन्नों के बीच दबी
कुम्हलाई पंखुड़ी सा झांक
नर्म, हथेलियों से सहला
आंखों में नीली मछली सा तैरता
तो कभी
कैंसर के डरावने निशान सा
जहरीले नाखूनों से मुंह नोंच
लहुलूहान कर आंखों में हरे जंगल सा जलता
फिर बिन बताए ही उठ पीठ पर जा धमकता
मैंने उसे सबकी पीठ पर बैठे देखा है
भले ही लोग उसे दुतकारें
प्यार से बांहों में भर गले लगाएं
भागें, बचें, दुलारें, पुचकारें
वह तो गुजरा वक्त है
जो उम्र के साथ
इकाई, दहाई सैंकड़े की सीढ़िया चढ़ता
सबकी पीठ पर बैठा है।