इस यात्रा को लेकर यह आरोप कि यह फोटो खिंचवाने के लिए थी, बचकानी लगती है। वाशिंगटन की राजकीय यात्रा के दौरान या हिरोशिमा में जी-7 शिखर सम्मेलन में या पिछले साल आसियान और दक्षिण पूर्व एशिया शिखर सम्मेलनों में जिस तरह से उनका स्वागत किया गया और पिछले साल सितंबर में जी-20 शिखर सम्मेलन की उन्होंने जिस तरह अध्यक्षता की, क्या उससे लगता है कि उन्हें फोटो खिंचवाने के लिए मौके की तलाश होनी चाहिए? चाहे उनके आलोचक मानें या नहीं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी व फ्रांस के राष्ट्रपतियों, ब्रिटिश, कनाडाई, जापानी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्रियों तथा जर्मनी के चांसलर से ज्यादा वरिष्ठ एवं राजनीतिक रूप से अधिक स्थायित्व वाले नेता हैं, उन सबसे ज्यादा मोदी की स्वीकार्यता है। वह वैश्विक नेता माने जाते हैं!
इसलिए पुतिन को यह बताते हुए कि ‘यह युद्ध का युग नहीं है’ (ताशकंद, एससीओ समिट) और ‘मौजूदा संघर्ष का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं पाया जा सकता’ (मास्को, जुलाई), उन्होंने युद्ध की भयावहता और इससे होने वाली मानवीय पीड़ा को रेखांकित करते हुए शांति की संभावनाओं को तलाशने की पहल की, जिससे न केवल दोनों युद्धरत देशों को लाभ होगा, बल्कि पूरे ग्लोबल साउथ के देशों को भी फायदा होगा, जो किसी पक्ष में शामिल हुए बगैर युद्ध के नकारात्मक परिणामों का खामियाजा भुगत रहे हैं।
युद्ध समाप्त करने के लिए रूस से बात करने का आग्रह करते हुए मोदी ने जेलेंस्की से कहा, 'मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि भारत शांति की दिशा में किसी भी प्रयास में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है। अगर मैं व्यक्तिगत रूप से इसमें कोई भूमिका निभा सकता हूं, तो मैं ऐसा करूंगा, मैं आपको एक मित्र के रूप में आश्वस्त करना चाहता हूं।'
उन्होंने पोलैंड से जेलेंस्की को संदेश भेजा था, 'आज का भारत सबसे जुड़ना चाहता है और सबके विकास की बात करता है। भारत सबके साथ है और सबके हितों के बारे में सोचता है...भारत इस क्षेत्र में स्थायी शांति का हिमायती है। हमारा रुख बहुत स्पष्ट है, यह युद्ध का युग नहीं है।' जाहिर है, जब मोदी ने इतना स्पष्ट कहा, तो छिपा हुआ एजेंडा कहां है?
मोदी ने पुतिन की तुलना में जेलेंस्की को ज्यादा गर्मजोशी से गले लगाया (हालांकि जेलेंस्की चिड़चिड़े से दिख रहे थे) और एक बड़े भाई की तरह उनके कंधे पर हाथ रखकर चले। मोदी के इन नेकनीयत इशारों से जेलेंस्की का गुस्सा शांत हो जाना चाहिए था। जुलाई में जब मोदी ने पुतिन को गले लगाया था, तो जेलेंस्की ने उसे शांति प्रयासों के लिए विनाशकारी बताया था। लेकिन जिस तरह से जेलेंस्की ने मोदी को लेकर ट्रेन के यूक्रेनी क्षेत्र से रवाना होने से पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत की आलोचना की, वह अत्यंत अशिष्ट और अकूटनीतिक था।
करण थापर और पूर्व विदेश सचिव और रूस के राजदूत कंवल सिब्बल जैसे कुछ टिप्पणीकारों ने उनकी टिप्पणियों को असभ्य और अपरिपक्व कहा है। उन्हें लगा कि जेलेंस्की ने भारत को नीचा दिखाया और ऐसी शर्तें तय करने की कोशिश की, जो अमेरिकियों ने भी कभी नहीं कीं। विदेश मंत्री जयशंकर ने कीव में अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अगले शांति सम्मेलन का प्रारूप यूक्रेन पर निर्भर करता है, जबकि भारत का मानना है कि किसी भी व्यावहारिक प्रगति के लिए रूस की उपस्थिति आवश्यक है।
अगर मोदी की यात्रा इतनी महत्वहीन थी, जैसा कि मोदी के आलोचक आरोप लगा रहे हैं, तो बाइडन और पुतिन, दोनों को यह जानने में इतनी दिलचस्पी क्यों थी कि जेलेंस्की के साथ उनकी बातचीत में क्या हुआ? हालांकि उम्मीदें बहुत कम थीं, लेकिन यह व्यर्थ की कवायद नहीं थी। यह शांति की संभावनाओं को तलाशने का एक प्रयास था कि सैन्य टकराव खूनी संघर्ष को समाप्त करने का कोई विकल्प नहीं है, जिससे दुनिया भर में लाखों लोग प्रभावित होते हैं। क्या इस संदेश को आगे बढ़ाने के लिए मोदी से अधिक उपयुक्त और बेहतर कोई अन्य विश्व नेता है?
कई लोगों ने यात्रा के समय पर सवाल उठाए हैं, जब यूक्रेन ने कुर्स्क में 1,400 वर्ग किलोमीटर रूसी क्षेत्र पर कब्जा करने का दावा किया है और रूस ने कीव में भयंकर ड्रोन हमला किया है और डोनेट्स्क क्षेत्र में बढ़त हासिल की है। क्या दोनों पक्ष जहां तक संभव हो, दूसरे के क्षेत्र पर कब्जा करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, ताकि बातचीत की मेज पर सौदेबाजी की जा सके?
भयंकर हमलों के बावजूद यह निर्विवाद है कि रूस, यूक्रेन, अमेरिका, यूरोपीय संघ और नाटो तथा ग्लोबल साउथ-सभी इस संघर्ष का शीघ्र अंत चाहते हैं। यदि दोनों युद्धरत पक्ष सीधे ऐसा नहीं कर सकते और संयुक्त राष्ट्र कोई भूमिका निभाने में अक्षम साबित हुआ है, तो ग्लोबल साउथ का नेता बनने की आकांक्षा रखने वाले राष्ट्र के रूप में भारत द्वारा प्रयास करने में क्या बुराई है? भारत को अगला शांति सम्मेलन आयोजित करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन जेलेंस्की की शर्तों पर नहीं और रूस को उसमें उपस्थित होना चाहिए।
जैसा कि प्रोफेसर मट्टू ने संडे टाइम (25 अगस्त) में अपने लेख में सुझाया है कि मोदी की यूक्रेन यात्रा भारत के समग्र रणनीतिक विकल्पों के सूक्ष्म पुनर्मूल्यांकन का संकेत दे सकती है। इसे 'पूरी तरह बकवास' कहकर खारिज करना भोलापन है। पुतिन के साथ फोन पर बातचीत में मोदी ने 'संघर्ष के शीघ्र, स्थायी और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करने के लिए भारत की दृढ़ प्रतिबद्धता दोहराई।'
बाइडन ने भारतीय प्रधानमंत्री की यूक्रेन के लिए शांति और निरंतर मानवीय सहायता के संदेश के लिए सराहना की। ऐसे में, अगले महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के दौरान होने वाली चर्चाओं से यूक्रेन पर दूसरे शांति सम्मेलन के आयोजन की दिशा में कुछ गति की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।