लड़कपन से मेरा यह मानना रहा है कि जासूसी होती रहनी चाहिए। जासूसी होती रहती है, तो बंदे के सारे टांके दुरुस्त रहते हैं। न वह हवा में ज्यादा उड़ता है, और न छोड़ता है। उसे हर पल यह 'भय' रहता है कि तीसरी आंख कहीं उसे और उसकी हरकतों को देख न ले! फिर जो लोग जासूसी के नाम से ही 'भड़क' जाते हैं, उनके मन में कहीं न कहीं 'चोर' जरूर होता है। वरना जासूसी से भला क्या घबराना? यों भी, जासूसी ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे की तो होती नहीं, यह तो हमेशा बड़े लोगों की होती है। अगर कोई बड़ा न भी हो, तो जासूसी होने के बाद वह बड़ा हो जाता है। इन खबरों का मीडिया में आना बंदे को और प्रतिष्ठित बना देता है।
सच बोलूं, तो मेरी भी बहुत इच्छा है कि कोई मेरी जासूसी करे। कुछ ऐसा-वैसा पाए जाने पर मेरी जासूसी से जुड़ी खबरें तमाम बड़े अखबारों में आएं। बड़े-बड़े लेखक-स्तंभकार और नेता लोग मुझे 'नोटिस' करें। न केवल देश, बल्कि विदेशी मीडिया में भी मेरी जासूसी की खबर सनसनी टाइप बने।
ऐसा कम ही सुनने या पढ़ने में आता है कि लेखक लोगों की जासूसी की गई हो। ज्यादातर जासूसी नेता या कुख्यात टाइप लोगों की ही की जाती है, या जिन पर सरकार या खुफिया एजेंसियों को 'शक' हो। यह शक भी बड़ी ऊंची बला है। कब, कहां और किस पर यह डेवलप हो ले, पता नहीं चलता। कभी-कभी तो बंदा शक के आधार पर ही 'फेमस' हो लेता है।
एक दफा शक के आधार पर ही पत्नी मेरी जासूसी भी करवा चुकी है। बाद में पता लगने पर मुझे 'गुस्सा' नहीं, बल्कि खुद पर 'गर्व' टाइप फील हुआ था। इस फीलिंग को आगे बनाए रखने के लिए ही मैं खुद की जासूसी करवाने के पक्ष में हूं। न जी, यह मत सोचें कि जासूसी से 'बदनामी' होती है, बल्कि इससे 'नाम' मिलता है! आजकल हर जगह 'नाम' का ही 'जोर' है। जिसका नाम वही 'महान' है। इस जोर और महानता के दमखम को मैं बनाए रखना चाहता हूं और खुफिया एजेंसियों से अपील करता हूं कि मेरी भी जासूसी करें। बाकी तो जो है, सो है ही पियारे।