अब यह भी कोई बात हुई। तेल के दाम जरा-से बढ़ क्या गए, पब्लिक ने नसीब को ही कोसना शुरू कर दिया। अपने नसीब को कोसती, तब तो फिर भी गनीमत थी। पब्लिक का नसीब कौन-सा राजा का नसीब है, जो कोसनों से डरे। जो नसीब पहले ही एकदम डाउन हो, उसे कोसनों का क्या डर? पर पब्लिक तो प्रधानमंत्री जी के नसीब को कोसने पर उतर आई है। उस पर तुर्रा यह कि प्रधानमंत्री जी ने तो खुद ही कहा था उनकी खुशनसीबी से दुनिया भर में तेल के दाम गिर रहे थे। किसी की खुशनसीबी से अगर दुनिया भर में तेल के दाम गिर सकते हैं, तो उसकी बदनसीबी से तेल के दाम बढ़ भी सकते हैं!
फिर भी हम तो यही कहेंगे कि तेल के जरा-से दाम बढ़ने पर एक नसीब वाले के नसीब को कोसने लगना ठीक नहीं है। यह अन्याय है। कोई यह न भूले कि एक बेचारे का नसीब दुनिया भर में तेल के दाम को ठेल कर, कहां से कहां तक लाया था। लगने लगा था कि सरकारी खजाने के भी नसीब जाग गए हैं। बेचारे के नसीब से और कितना काम कराएंगे? शोषण की भी एक हद होती है, चाहे खुशनसीबी का ही शोषण हो। फिर सब काम प्रधानमंत्री जी के नसीब से ही कराएंगे या कुछ अपने नसीब को भी करने देंगे। बदनसीब तो खुद हैं, जो तेल के दाम दुनिया भर में गिरते-गिरते पलटकर उल्टे चल पड़े हैं और खोट निकाल रहे हैं प्रधानमंत्री जी के नसीब में।
वैसे भी प्रधानमंत्री की खुशनसीबी से अपने फायदे की मांग करने का अधिकार यहां की पब्लिक पहले ही खो चुकी है। दिल्ली के चुनाव में खुशनसीब को ठुकराने के बाद अब किस मुंह से पब्लिक उनसे खुशनसीबी की मांग कर सकती है? सिर्फ तेल के दाम के मामले में ही क्यों, सभी मामलों में। खुद बदनसीबी को चुनने के बाद पब्लिक को अब अच्छे दिनों की उम्मीद भी छोड़ देनी चाहिए। पब्लिक के अच्छे दिन अब नहीं आने के। हां! उनके अच्छे दिनों की बात दूसरी है, जिन्होंने ईमानदारी से प्रधानमंत्री जी की खुशनसीबी को ही अपना नसीब बनाए रखा है।