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मुद्दा: अब दिमाग में भी प्लास्टिक... इंसानी सेहत पर भयानक असर; लगभग 800 समुद्री और तटीय प्रजातियों पर खतरा

सीमा जावेद Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Mon, 17 Feb 2025 05:08 AM IST

सार

तमाम चेतावनियों के बाद भी इन्सान ने प्लास्टिक का उपयोग भले न छोड़ा हो, प्लास्टिक ने उसके दिमाग में प्रवेश करना जरूर शुरू कर दिया है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


अब वैज्ञानिकों ने इन्सान के दिमाग में भी माइक्रोप्लास्टिक पाया है। हाल ही में साइंस एडवांस में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, प्लास्टिक के नैनो  या अति सूक्ष्म कण इन्सान के दिमाग में भी प्रवेश कर रहे हैं। इस अध्ययन में पहली बार मानव मस्तिष्क के ऊतकों में प्लास्टिक्स के अति सूक्ष्म कण मिले हैं। हालांकि इसके इन्सानी दिमाग पर होने वाले दुष्प्रभावों का पूरी तरह आकलन होना बाकी है, लेकिन वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि नैनो प्लास्टिक के कण का आकार इतना अति सूक्ष्म है कि रक्त कोशिकाओं के माध्यम से वह ब्लड ब्रेन बैरियर को पार करके मानव मस्तिष्क में प्रवेश करने में सफल है।


मौजूदा अध्ययन दर्शाता है कि प्लास्टिक प्रदूषण बहुत ज्यादा व्यापक है और मानव स्वास्थ्य पर इसका भयानक प्रभाव पड़ता है।


गौरतलब है कि ब्लड ब्रेन बैरियर या रक्त-मस्तिष्क बाधा (बीबीबी) रक्त और मस्तिष्क के बीच एक चयनात्मक अर्ध-पारगम्य झिल्ली (सेमी पर्मिएबल मेम्ब्रेन) है, जो मस्तिष्क रक्त वाहिकाओं को रक्त से मस्तिष्क में अणु के प्रवेश को नियंत्रित करती है।

अब तक माइक्रोप्लास्टिक (एमपी) इन्सान के लीवर, किडनी, प्लेसेंटा और रक्त सहित विभिन्न ऊतकों में पाए जा चुके हैं। प्लास्टिक खाद्य शृंखलाओं को बाधित करने, पानी और मिट्टी को दूषित करने और पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरे के साथ पारिस्थितिक प्रभाव भी पैदा कर रहे हैं। इसके बावजूद दिसंबर 2024 में दक्षिण कोरिया के बुसान में वैश्विक प्लास्टिक संधि (जीपीटी) के  पांचवें दौर में भी कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। ज्ञात हो कि पृथ्वी पर प्लास्टिक के बढ़ते खतरे के बीच, दुनिया के देशों ने मार्च, 2022 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता करने पर सहमति व्यक्त की–जिसे वैश्विक प्लास्टिक संधि (जीपीटी) के रूप में भी जाना जाता है–जिसका उद्देश्य 'प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करना' है।


मार्च 2022 में, जब यूएनईए में प्लास्टिक संधि के लिए प्रस्ताव अपनाया गया था, तो इसे 'पेरिस समझौते के बाद सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरण बहुपक्षीय समझौता' कहा गया और 2040 तक प्लास्टिक प्रदूषण के उन्मूलन का लक्ष्य रखा गया, लेकिन फिलहाल इसमें कोई प्रगति नहीं दिखाई दे रही है।


दरअसल पेट्रोलियम समृद्ध देश प्लास्टिक उत्पादन को कम नहीं करना चाहते और कचरे के मैनेजमेंट पर जोर दे रहे हैं। वहीं विकासशील देश अपने बड़े प्लास्टिक उत्पादक वर्कफोर्स को ध्यान में रखते हुए आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन चाहते हैं। ऐसी परस्पर विरोधी प्राथमिकताओं के बीच प्लास्टिक का पूरी तरह प्रतिबंधित होना मुश्किल है और कचरा प्रबंधन के जरिये दोबारा इस्तेमाल किया जाना ही इसका एक रास्ता नजर आ रहा है। ऐसे में शायद भारत द्वारा सिंगल यूज (एकल उपयोग) प्लास्टिक पर लगाया गया प्रतिबंध ही एकमात्र रास्ता निकले।


प्लास्टिक उत्पादन में वृद्धि से स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी बढ़े हैं। 1950 में दुनिया भर में केवल 15 लाख टन प्लास्टिक का उत्पादन होता था और 2022 में यह आंकड़ा 400 करोड़ टन तक पहुंच गया। 2050 तक प्लास्टिक उत्पादन, उपयोग और निपटान द्वारा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन उस कुल उत्सर्जन का 15 प्रतिशत होगा, जो ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री से नीचे रखने के लिए अधिकतम सीमा है। आज हर साल 1.1 करोड़ टन प्लास्टिक समुद्र में चला जाता है। यह आंकड़ा 2040 तक तीन गुना हो सकता है। समुद्री कचरे में 85 फीसदी हिस्सा प्लास्टिक का है। लगभग 800 समुद्री और तटीय प्रजातियां प्लास्टिक निगलने या इसमें उलझने सहित विभिन्न तरीकों से खतरे में हैं। कुल प्लास्टिक कचरे में 60 फीसदी से अधिक हिस्सा सिंगल यूज (एकल उपयोग) प्लास्टिक का है।

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