इसे बेहतर तरीके से समझने के लिए दो नवीनतम घटनाक्रम पर गौर करने की जरूरत है। पहला, बिहार में 60 फीसदी युवा रोजाना पांच घंटे से ज्यादा समय रील बनाने में बिता रहे हैं। फेसबुक, यू-ट्यूब, इंस्टाग्राम और ओटीटी प्लेटफॉर्म के प्रति दीवानगी का वायरस पूरे देश में विकराल तरीके से फैल गया है। इसलिए अधिकांश इन्फ्लुएंसर्स घटिया, आपत्तिजनक, अश्लील और शर्मनाक कंटेंट के दम पर सोशल मीडिया से शोहरत और पैसे, दोनों कमा रहे हैं। धर्म और पारिवारिक व्यवस्था के उपहास से भी तात्कालिक लोकप्रियता बढ़ती है। महाकुंभ को लेकर भ्रामक खबरें प्रसारित करने वाले सोशल मीडिया के 22 अकाउंट्स और उनके संचालकों के खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस ने एफआईआर दर्ज की हैं।
दूसरा, ओटीटी, सोशल मीडिया और यू-ट्यूब में वयस्क और पोर्नोग्राफिक कंटेंट का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। युवाओं में दक्षता की कमी की वजह से भारत टेक लीडर के बजाय सोशल मीडिया की खपत का सबसे बड़ा बाजार बन गया है। इससे गरीबी, बेरोजगारी, अपराध और असमानता बढ़ रही है। ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अनेक देशों में सोशल मीडिया के कहर से बच्चों को बचाने के लिए सख्त कानून बने हैं।
राम-रहीम को पैरोल और कई अन्य विवादित मामलों की आड़ में इन्फ्लुएंसर्स के गाली-गलौज को सही ठहराना संविधान सम्मत नहीं है। इलाहाबादिया की माफी और आयोजकों द्वारा वीडियो हटाने के बाद उनका अपराध स्वतः पुष्ट है। संविधान के अनुच्छेद-19 में अभिव्यक्ति की आजादी का मौलिक अधिकार हासिल है, लेकिन उससे शिष्टता, नैतिकता और सामाजिक व्यवस्था बाधित नहीं होनी चाहिए। इंग्लैंड में वर्ष 1868 में हिकलिन और अमेरिका में वर्ष 1957 में रोथ मामले में वहां की सर्वोच्च अदालत ने अश्लीलता को समय और समाज सापेक्ष माना था। सुप्रीम कोर्ट ने नए फैसले में कहा है कि किसी महिला को नाजायज पत्नी या वफादार रखैल कहना स्त्री विरोधी होने के साथ संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है। तो फिर अभद्रता और गाली-गलौज करके बच्चों का भविष्य तबाह करने वाले इन्फ्लुएंसर्स को सांविधानिक संरक्षण क्यों मिलना चाहिए?
इंटरनेट और सोशल मीडिया में आपत्तिजनक कंटेंट को रोकने के लिए आईटी ऐक्ट में धारा-66-ए का प्रावधान था। सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया सिंघल मामले में वर्ष 2015 में उस कानून को निरस्त कर दिया था। तत्कालीन आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद के अनेक वादों के बावजूद पिछले 10 वर्षों में सरकार ने नई कानूनी व्यवस्था नहीं बनाई। नतीजतन आईपीसी और अब बीएनएस के तहत मामले दर्ज करके मनमाने ढंग से गिरफ्तारी का रिवाज बढ़ गया है।
संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार, साइबर और सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार को ही कानून बनाने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के अनेक आदेश और संसदीय समितियों की सिफारिशों के बावजूद केंद्र सरकार प्रभावी कानून नहीं बना रही। इस मामले में विवाद के बाद यू-ट्यूब से आपत्तिजनक वीडियो हट गया, लेकिन करोड़ों अन्य मामलों में यू-ट्यूब जैसी अमेरिकी कंपनियां अदालत के आदेश के बगैर कार्रवाई नहीं करतीं। आईटी इंटरमीडियरी नियमों के तहत सोशल मीडिया कंपनियों की भारत में कानूनी जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत है।
इन्फ्लुएंसर्स से समाज के साथ वित्तीय तंत्र भी परेशान है। व्हाट्सएप और टेलीग्राम से अवैध इन्फ्लुएंसर्स के खिलाफ कार्रवाई के लिए और अधिकार हासिल करने के लिए पूंजी बाजार नियामक सेबी ने केंद्र सरकार से मांग की है। टेलीकॉम कंपनियों के अनुसार, ट्राई के नए नियमों के दायरे से टेलीमार्केटर्स और ओटीटी प्लेटफॉर्म को बाहर रखने की वजह से स्पैम कॉल और साइबर अपराध से निजात पाना मुश्किल है। वित्त मंत्रालय ने डीपसीक और दूसरे एआई प्लेटफॉर्म के सरकारी इस्तेमाल के खिलाफ आदेश जारी किया है। भारत में पांच साल पहले चीन और दूसरे देशों के 200 एप्स को बैन किया गया था। उनमें से 36 से ज्यादा प्रतिबंधित एप्स चोर दरवाजे से भारत में कारोबार कर रहे हैं।
जो नियम टीवी और प्रिंट के लिए हैं, वही डिजिटल मीडिया के लिए भी हैं। आपत्तिजनक कंटेंट हटाने, किसी एप या वेबसाइट को प्रतिबंधित करने का अधिकार आईटी मंत्रालय के पास है। इसके बावजूद इंडियाज गॉट लैटेंट शो के आपत्तिजनक वीडियो हटाने के लिए एनएचआरसी समेत कई लोग क्रेडिट लेने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले कई चुनावों में हस्तक्षेप करने वाली सोशल मीडिया कंपनियों को संसदीय समिति ने पूछताछ के लिए कई बार बुलाया है, लेकिन इस मामले में इलाहाबादिया और दूसरे लोगों की संसदीय समिति के सामने पेशी की मांग करना पुलिस और अदालती व्यवस्था की नाकामी को दर्शाता है।
ग्रेशम लॉ के अनुसार, खोटे सिक्के अच्छे सिक्कों को चलन से बाहर कर देते हैं। ब्राजील ने जबसे बच्चों के मोबाइल फोन इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया है, वहां बच्चों के खेल के मैदान दोबारा जीवंत हो गए हैं। इसलिए समाज और पारिवारिक व्यवस्था को ध्वस्त करने वाले डर्टी इन्फ्लुएंसर्स की सुनामी को रोकने के लिए ठोस कानून और प्रभावी रेगुलेटर लाने की जरूरत है। ऐसे एंटीसोशल इन्फ्लुएंसर्स को नेताओं का संरक्षण और सरकारी विज्ञापन नहीं मिलना चाहिए। मुकदमा चलाने के साथ उन्हें सोशल मीडिया में लंबे समय के लिए बैन करना तार्किक होने के साथ न्यायसंगत भी होगा।