मैं तारिक फतह का सम्मान करती हूं। जब इस देश के मुस्लिम बुद्धिजीवी, मौलाना और राजनेता तारिक फतह को यहां से भगाने की कोशिश में लगे हुए हैं और हमारे ‘सेक्यूलर’ मिजाज के राजनेता रोज यह कहते फिर रहे हैं कि पाकिस्तानी मूल के इस कनाडा निवासी को भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि वह मुसलमानों के खिलाफ बोलते हैं, तब ऐसा कहना आसान नहीं है। दिल्ली स्थित जश्न-ए-रेखता के वार्षिक सम्मेलन में जब फतह साहब शायरी सुनने और उर्दू की किताबें खरीदने गए, तो मुस्लिम नौजवानों ने उन्हें घेरकर लात-घूंसे मारे और कोई उन्हें बचाने के लिए आगे नहीं आया। पुलिस उनको ही गिरफ्तार करने के लिए आई, हिंसक भीड़ को रोकने के लिए नहीं।
तारिक फतह क्या कह रहे हैं, जिससे यहां के मुसलमानों को इतनी तकलीफ़ हो रही है? एक तो यह कह रहे हैं कि भारत के मुसलमानों की वफादारी इस देश की मिट्टी से होनी चाहिए, अरब मुल्कों से नहीं। वह यह भी कह रहे हैं कि इस बात को स्वीकार करना बहुत जरूरी हो गया है कि इस्लाम में महिलाओं को बराबर का दर्जा मिलना चाहिए। फतह साहब मुस्लिमों को एहसास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि इस्लाम में कुछ ऐसी चीजें हैं, जिन्हें बदलना जरूरी है। खासकर आज के दौर में गैर मुस्लिमों को काफिर कहना गलत है।
यही बात भारतीय शायर मिर्जा वाजिद हुसैन चंगेजी ने भी इन शब्दों में कही थी, सब तेरे सिवा काफिर आखिर इसका मतलब क्या, सर फिरा दे इंसान का ऐसा खब्त-ए-मजहब क्या। वहाबी इस्लाम का असर दुनिया में फैल जाने के कारण हमारे मुसलमान भी इससे प्रभावित होते दिख रहे हैं। महिलाओं के बदलते लिबास और मौलवियों के कट्टरपंथी खुत्बों से इसका सबूत मिलता है। इसका परिणाम यह है कि यहां के मुसलमान अपनी ही सूफी विरासत को भूलने लग गए हैं। यह भी कहना जरूरी है कि वामपंथी राजनेताओं ने कट्टर इस्लाम का साथ न दिया होता, तो शायद यह नौबत न आती।
सो सिंध में पिछले दिनों जब शहबाज कलंदर की दरगाह पर आत्मघाती हमला हुआ, तो उस हमले के खिलाफ भारत से बहुत कम आवाजें सुनाई पड़ीं। उल्टे पाकिस्तान से ज्यादा आवाजें सुनाई पड़ीं कि इस्लाम का यह सूफियाना रूप उनकी विरासत है। सूफियाना इस्लाम भारत के सनातन धर्म से प्रेरणा लेकर पैदा हुआ। सूफियाना इस्लाम भारत की भी विरासत है और इसे सुरक्षित रखना आज और भी ज्यादा जरूरी हो गया है, क्योंकि वहाबी इस्लाम का हिंसक, जेहादी रूप देख कई देश इस्लाम के खिलाफ हो गए हैं। सो अगर हम यह दिखा सकें कि सूफियाना इस्लाम की वजह से भारत में सदियों से हिंदू-मुस्लिम शांति-प्यार से रह रहे हैं, तो हो सकता है कि इस्लाम को लोग नई नजरों से देखने लगें।
तारेक फतह यह समझ गए हैं और अन्य मुसलमानों को समझाने के लिए उन्होंने अपनी आवाज उठाई है। पर अफसोस कि उनको सुनने के बदले लोग उन्हें भगाने में लगे हुए हैं। वह न मुसलमानों के खिलाफ बोल रहे हैं और न ही इस्लाम के खिलाफ। पर कोई उनको सुनने को तैयार ही नहीं है। मौलवियों का एतराज तो समझा जा सकता है, पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों और राजनेताओं को इतनी तकलीफ क्यों हो रही है? क्या वे नहीं चाहते कि इस्लाम का जो स्वरूप भारत की विरासत है, उसे जिंदा रखना जरूरी है? कितना अजीब है कि तारिक फतह को भगाने की कोशिश में सेक्यूलर बुद्धिजीवी इन दिनों सबसे आगे हैं।